Saturday, June 2, 2018

मोदी सरकार के 4 साल, युवाओं के क्या हाल... !

साल 2014 की मई में सूर्य के प्रचंड कोप का शिकार भारत हो रहा था। तपती दिल्ली की सियासत तल्ख़ और तेज़ हो चुकी थी। भारत के पुरातन काल की राजनीति से देश के युवाओं का मन ऊब चुका था। युवा अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ एक ऐसे व्यक्ति को सत्तासीन करने जा रहा था जिसने राजनीति के अपार संभावनाओं को जनता के आगे प्रस्तुत किया था। प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र दामोदरदास मोदी पारंपरिक राजनीति से अलग हटकर एक ऐसी राजनीति की स्थापना करने का संकल्प ले चुके थे कि युवा भारत के राजनीतिक धमनियों में ऊर्जा का अद्भुत रक्त संचालित हो रहा था। बीते 10 बरस के शासनकाल में घोटालों की लंबी फ़ेहरिस्त ने युवाओं के राजनीतिक विचार को निराश कर दिया था। अंतराष्ट्रीय पटल पर भारत की निराशाजनक छवि के कारण युवाओं के भीतर हीन भावना जाग चुका था। रोजगार की घोर कमी और शिक्षा की गुणवत्ताहीन स्तर ने युवाओं के भीतर की तमाम ऊर्जाओं को नष्ट कर चुका था। युवाओं की उम्मीदों के उन्मादों ने प्रचंड बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाया, जिसके ज़रिये युवा भारत के युवाओं की सारी परेशानियों का अंत हो सके। चुनावी सरगर्मियों में युवाओं के ज़ुबान से हर-हर मोदी, घर-घर मोदी के अल्फ़ाज़ निकल रहे थे। प्रधानमंत्री बनते ही प्रधानमंत्री मोदी ने निर्णय लिया कि उनके मंत्रिमंडल में 70 बरस से कम उम्र के लोग ही मंत्री बनेंगे। प्रधानमंत्री मोदी के इस निर्णय के ज़रिए युवाओं में संदेश गया कि युवा भारत के कल्पना की यह पहली हकीकत है। प्रधानमंत्री एक के बाद एक ऐसे फैसले लेते गए जिससे युवाओं में प्रधानमंत्री के युवा होने का एहसास बना रहा। 28 सितंबर 2014 को प्रधानमंत्री मोदी पहली बार अमेरिका के दौरे पर गए जहाँ न्यूयॉर्क स्थित मेडिसन स्क्वायर में उन्हें भारतीय नागरिकों और एनआरआई को संबोधित किया।  प्रधानमंत्री मोदी लोगों को संबोधित करते हुए बताया कि भारत की सबसे बड़ी ताकत युवा शक्ति है। भारत विश्व का सबसे युवा देश है। भारत के नागरिकों को हताश होने को ज़रूरत नहीं है भारत बहुत तेजी से तरक्की के पथ पर आगे जाएगा और उसका एकमात्र कारण होगा भारत के युवाओं की योग्यता। 

प्रधानमंत्री ने युवाओं की बातें करके भारत के काल्पनिक गौरव का अभिमान राष्ट्रीय से लेकर अंतरष्ट्रीय लोगों तक जगाया और बदले में प्रधानमंत्री खूब तालियां भी हासिल की। देश के विकास में युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी योजना आयोग को रद्द कर नीति आयोग का गठन किया, जो 1 जनवरी 2015 से भारत में सक्रिय हो जाता है। उसके बाद युवाओं को रोजगार देने के लिए युवाओं के कौशल को विकसित करने के नाम पर 'स्किल इंडिया' नाम से योजना 15 जुलाई 2015 से प्रारंभ किया जाता है। इस योजना के तहत प्रधानमंत्री मोदी का लक्ष्य था 2022 तक 40 करोड़ लोगों के कौशल को विकसित कर रोजगार देने का। ऐसे और भी प्रधानमंत्री मोदी के कई भाषणों और संबोधनों में युवाओं के हितों और उज्ज्वल भविष्य का ज़िक्र मिलता है।


लेकिन बीते 4 बरस में युवाओं के गौरवगान और युवा भारत के महिमामंडन के बाद भारत के युवाओं को असल मायनों में हासिल क्या हुआ। क्योंकि बात यदि रोजगार और किसान की करें तो भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र से शुरू करते हैं जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने संकल्प पत्र भी कहा था। भाजपा के घोषणा पत्र के अनुसार हर साल 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देने बात कही गयी थी। 

भारत में बेरोजगारी दर बढ़ने के अनुमान पर वर्ल्ड एम्प्लॉयमेंट एंड सोशल आउटलुक रिपोर्ट में अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी नवीनतम ‘वर्ल्ड एम्प्लॉयमेंट एंड सोशल आउटलुक’ रिपोर्ट में वर्ष 2017 तथा 2018 में भारत में बेरोजगारी दर में 3.5 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया गया। वर्ष 2017 में देश में बेरोज़गारों की संख्या 17.8 मिलियन की बजाय 18.3 मिलियन तक रहने का अनुमान व्यक्त किया गया था। वर्ष 2018 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुमान के मुताबिक बेरोज़गारों की संख्या 18.6 मिलियन रहने का अनुमान है, जबकि पहले इसी रिपोर्ट में बेरोज़गारों की संख्या 18 मिलियन रहने का अनुमान लगाया गया था। प्रतिशत के संदर्भ में ILO ने सभी तीन वर्षों 2017, 2018 और 2019 के लिये भारत में बेरोज़गारी दर 3.5% पर स्थिर रहने का अनुमान लगाया है। एशिया पैसिफिक क्षेत्र में 2017 से 2019 के दौरान 23 मिलियन नई नौकरियाँ सृजित होंगी और भारत सहित अन्य दक्षिण एशियाई देशों में नए रोज़गार सृजित होंगे किंतु पूरे क्षेत्र में बेरोज़गारों की संख्या बढ़ेगी। 

देश के युवा केवल रोजगार के भरोसे ही नहीं निराश नहीं हो रहे बल्कि देश के और भी आँकड़े हैं जिसने युवाओं के तमाम कल्पनाओं को कल्पना ही बने रहने दिया। 2017-18 में विकास दर घटकर 6.7% रह गई। यह मोदी सरकार के चार सालों में सबसे कम वृद्धि दर है। पिछले वित्त वर्ष 2017-18 का हिसाब देखने पर स्थितियाँ विकट है। कृषि क्षेत्र में 2017 में वृद्धि दर 6.3% रहा था, यह 2018 में गिरकर 3.4% रह गया है। मैन्युफैक्चरिंग में 9.2% की दर घट कर 7.2% पर आ गयी है। खनन में तो व्यापक गिरावट दर्ज की गई है।खनन क्षेत्र में 13.9% की दर सिर्फ़ 2.9% रह गयी है। सकल फ़िक्स्ड पूँजी निर्माण 10.1% से घटकर 7.6% पर आ गयी। लोक प्रशासन में भी 0.7% की गिरावट रही है। तो देश के भीतर युवाओं की चिंताओं को देखते हुए देश के ज़हन में यह सवाल आना लाज़मी है कि बीते 4 बरस में युवा भारत के युवाओं की कितनी नौकरियां मिली। युवा भारत के युवाओं का विकास दर क्यों 2014 के उम्मीदों और दावों के विपरीत खड़ी है। क्योंकि युवाओं ने इसी सरकार और प्रधानमंत्री के खिलाफ सड़क पर उतरकर आवाज़ भी बुलंद की है। हैदराबाद विश्वविद्यालय के रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या का आरोप सरकार पर लगाकर छात्रों ने राष्ट्रीय आंदोलन किया हो। अथवा जेएनयू में देश विरोधी नारों के लगने के आरोप पर छात्रों का आंदोलन रहा हो। फिर देश में जब युवा ही सत्ता से नाखुश हो और वज़ह भी सिर्फ नौकरी की कमी ही नहीं रही हो तो युवा भारत के प्रधानमंत्री युवाओं के सपनों को कैसे साकार करेंगे। हालांकि प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों ने फिटनेस चैलेंज के ज़रिए युवाओं को साधने की कोशिश की है तो सवाल यही है कि 15 दिनों से अधिक एसएससी परीक्षा के युवा परीक्षार्थी अनशन और आंदोलन के ज़रिए सरकार के नाक के नीचे एसएससी परीक्षा में भ्रष्टाचार के जाँच की मांग करते रहे लेकिन प्रधानमंत्री ने यहाँ युवा भारत के युवा नागरिकों के आंदोलन पर सुध लेना भी लोकतांत्रिक जबाबदेही की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की।

Thursday, May 24, 2018

'फिटनेस चैलेंज' मुहिम इंडिया और भारत के बीच का अंतर है या सत्ता-सेलिब्रिटी कल्चर की बेशर्मी !

इंडिया और भारत के बीच इस व्यापक फर्क को पहचानिए जिसने नागरिकों के बैद्धिकता को कैद कर लिया है और नागरिक इसे सामान्य तौर पर समझ रहे हैं। देश में "फिट इंडिया" नाम से एक कैंपेन शुरू हुआ है। जिसके तहत इंडिया के सेलिब्रिटी कल्चर के नागरिक एयर कंडीशनर में बैठ कर कसरत करते हुए वीडियो बना  रहे हैं और अन्य लोगों को चैलेंज करते हुए इस मुहिम को जनमुहिम बनाने की गुज़ारिश भी कर रहे हैं। अब देश के भारतीय नागरिकों को इंडियन कल्चर के इस मुहिम के पीछे की वस्तुस्थिती को बारीकी से समझनी होगी। क्योंकि इस मुहिम में इंडियन गवर्नमेंट की सरकारी  तंत्र की कवायद से इंडियन सेलिब्रिटी ने इस मुहिम को हाथों-हाथ उठा लिया। अब इस इंडियन मुहिम के पचड़े में भारतीय नागरिकों के कई मौलिक और बुनियादी सवाल खत्म हो गए। इंडियन मानसिकता के लोगों के लिए देश के समक्ष कोई बड़ी आपदा भले ही दिखाई नहीं पड़ रही हो लेकिन भारतीय नागरिकों के लिए देश के मुंहाने पर कई गंभीर सवाल खड़े हैं। बेरोज़गारी, भुखमरी, पेट्रोल की बढ़ती कीमतें, नागरिकों की असुरक्षा, शैक्षणिक गुणवत्ता, परीक्षा की निष्पक्षता आदि जैसे कई गंभीर और भयावह चुनौती देश के आगे खड़ी है लेकिन इन जटिल समस्याओं पर न तो कोई मंत्री मुहिम चलाने की कोशिश करता है और न ही कोई सेलेब्रिटी इस पर प्रधानमंत्री को टैग कर इन समस्याओं को तोड़ने की चुनौती देता है। तो सवाल यही है कि क्या हमारा देश दो नामों के संदर्भ में बंट चुका है। क्योंकि तमाम संसाधनों से पर्याप्त सेलेब्रिटी इन मुद्दों की बात नहीं करता है। और जो इन मुद्दों की पीड़ा में उलझा है, वो इन मुद्दों पर बात करना चाहता है और प्रधानमंत्री को टैग करता है तो न तो प्रधानमंत्री उस पर कोई रिप्लाई करते हैं और न ही कोई मंत्री इसे मुहिम बनाता हैं। तो सवाल यही उठता है कि क्या इन सामान्य नागरिकों के सवाल को केवल इस आधार पर तूल नहीं दिया जाता क्योंकि वह भारतीय नागरिक कोई सेलेब्रिटी नहीं है। प्रधानमंत्री 125 करोड़ नागरिकों के देश के जनसेवक होने का दावा करते हैं फिर एक बड़ी संख्या के जनता के सवालों का निराकरण क्यों नहीं करते है।
2017 के एक आंकड़े के अनुसार देश में 18.3 मिलियन युवा बेरोजगार है। बेरोजगारी पर रोक लगाने के लिए हर साल सरकार को 8.1 मिलियन रोजगार देने की आवश्यकता है। 15 साल से अधिक वर्ष के आयु में हर साल 1.3 मिलियन लोग प्रवेश कर रहे हैं। SSC परीक्षा पर छात्र धांधली का आरोप लगाते हैं लेकिन सरकार और सेलिब्रिटी मूक दर्शक बने रहते हैं। तो सवाल यही उठता है कि इंडियन यानी सरकार एवं सेलिब्रिटी और भारतीय यानी देश के आम नागरिक के बीच के बढ़ते फसलों को नजरअंदाज करना कितना मुनासिब होगा। अगर आम नागरिक सेलेब्रिटी नहीं बन पा रहे हैं तो फिर आम नागरिकों के संघर्षों के चैलेंज को कौन तोड़ेगा। सत्ता-सरकार केवल सेलेब्रिटियों और उसके चैलेंज में ही उलझे रहेंगे तो भारत के संघर्षों का चैलेंज और उसका निराकरण कौन करेगा।। विचार कीजिये और इसे सामान्य मत समझिये। इसे सामान्य तब माना जाता जब कोई गंभीर सवाल देश के मुंहाने नहीं खड़ा होता।

Sunday, April 22, 2018

भारत में लेनिन का वैचारिक इतिहास बनाम मूर्ति विध्वंस का वर्तमान !

देश में विगत महीनों में गाँधी, अम्बेडकर, लेनिन, पेरियार,श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि की प्रतिमा तोड़ी अथवा क्षतिग्रस्त की गई। प्रतिमा किसी व्यक्ति के जीवित ना होने पर उसके स्मरण के प्रतीक के रूप में स्थापित की जाती है। इतिहास में किसी व्यक्ति का कालखंड प्रासंगिक रहा है या भयावह किन्तु उसकी प्रतिमा का संरक्षण पारंपरिक जिम्मेदारी है। उसके ज़रिये हम नई नस्लों और पीढ़ियों को उस व्यक्ति के जीवनकाल से रूबरू कराते हैं। उन नस्लों को बताते है कि इनकी जीवनी ने हमारे समाज को प्रभावित किया या दुष्प्रचार किया। उससे नई नस्लें सीख लेती है और समाज,राष्ट्र के उत्थान को लेकर प्रचलित नीतियों का पूर्णावलोकन करती है। लेकिन वैचारिक कुंठा से ग्रस्त अराजकों ने इस अवधारणा को न तो समझने की ज़हमत उठाई और ना ही उसे फलने-फूलने दिया। नतीज़ा यह हुआ कि हम एक सुशोभित लोकतंत्र से कब वैचारिक अराजकतंत्र में तब्दील हो गए नागरिकों को पड़ताल ही नहीं हो पाया। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर विचारकों के विचारों को नष्ट कर सकते हैं। क्या उसके ज़रिए नीतिगत अवधारणाओं का प्रतिपादन वैकल्पिक कर सकते हैं। मूर्तियों को तोड़ कर कितनी विचारधारात्मक नीतियों को निम्न करने में सफलता प्राप्त हुई। ज़र्मनी का सबसे क्रूर शासक एडोल्फ़ हिटलर हुआ जिसने 1939 में अपने 'फाइनल सॉल्यूशन' नीति के ज़रिए यहूदियों को जड़ से मिटाना शुरू किया। 6 वर्ष के भीतर तक़रीबन 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी गयी। गैस चैम्बर में यहूदियों को डाल कर यातनाएं दी गयी। भारत में मूर्ति तोडकों को यह जानकर हैरत होना चाहिए और शिक्षा भी लेनी चाहिए कि आज भी जर्मनी उस भयावह खंडरों के इमारत को पर्यटन स्थल के तौर पर रखा गया है। ताकि उनकी नस्लें इस बात को महसूस कर सके कि उनके पूर्वजों ने किन यातनाओं और विध्वंसकारी आपदाओं का सामना किया है।

दरअसल सवाल यह है कि वैचारिक कुंठा ने निश्चित तौर पर बौद्धिक गुलामों को जकड़ रखा है और विचारधारा का विरोध प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दर्ज़ भी कर रहे हैं। लेकिन क्या उन्होंने इतिहास के संदर्भों को कभी पढ़ने या जानने की कोशिश की है। छद्म राष्ट्रवाद अथवा छद्म उदारवाद के छत्र तले वैचारिक महामारी तो फैलाने में इन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि ये लड़ाई भारतीय विचारक और विदेशी विचारक नहीं है। ये लड़ाई वैचारिक असहमतियों की है। फिर भी पेरियार,गाँधी, मुखर्जी, नेहरू, अम्बेडकर आदि तो भारतीय थे लेकिन जितना अधिक कुंठा लेनिन की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त करने के दौरान फैलाया गया है, क्या इनलोगों ने कभी लेनिन और तत्कालीन स्वाधीनता आंदोलन के महावीरों के बीच के रिश्तों का अवलोकन किया है।

एक खास वर्गों के द्वारा लेनिन को भारत का दुश्मन कहा जाता है जबकि जबकि भारत के पीड़ा को यदि सबसे पहले किसी अंतर्राष्ट्रीय नेता ने समझा तो वो ब्लादिमीर लेनिन ही थे। जिन्होंने 1908 में लिखा (https://www.marxists.org/history/etol/newspape/ni/vol08/no08/lenindia.htm)  था कि यदि रूस के बाद कहीं सबसे ज्यादा भुखमरी और गरीबी है तो वह भारत है। उस दौरान भारतीय नागरिक अपनी स्वाधीनता की लड़ाई लोकमान्य तिलक बाल गंगाधर के नेतृत्व में लड़ रहे थे। अंग्रेजी हुक़ूमत ने उस आंदोलन के दमन के लिए हर क्षुद्रता अपना चुकी थी। उस दौरान लेनिन ने अपने लेख में तिलक के ऊपर हुए हमलों की निंदा की थी। लेनिन ने अपने लेख में लिखा था:-

‘हिंदुस्तान के शासकों के रूप में असली चंगेज खां बन रहे हैं। अपने कब्जे की आबादी को ‘शांत करने के लिए’ वे सब कार्रवाईयां, यहां तक की हंटरों की वर्षा, कर सकते हैं...लेकिन देशी लेखकों और राजनीतिक नेताओं की रक्षा के लिए हिंदुस्तान की जनता ने सड़कों पर निकलना शुरू कर दिया है। अंग्रेज गीदड़ों द्वारा हिंदुस्तानी जननेता तिलक को दी गई घृणित सजा, थैलीशाहों के गुलामों द्वारा एक जननेता के खिलाफ की गई बदले की कार्रवाई की वजह से बंबई की सड़कों पर प्रदर्शन और हड़ताल हुई है। हिंदुस्तान का सर्वहारा वर्ग भी इतना काफी वयस्क हो चुका है कि एक वर्ग-जागृत राजनीतिक संघर्ष चला सके। अंग्रेजी शासन के भारत में दिन लद गए'। 

इन शब्दों की रचना के ज़रिए लेनिन ने भारतीय वेदना के चीत्कारों को दर्ज़ कर अपना क्षोभ और गुस्सा ज़ाहिर किया था। जिस दौर में रूस स्वयं अनेकानेक विसंगतियों से गुज़र रहा था। उस दौर में सोवियत संघ के राष्ट्रप्रमुख ब्लादिमीर लेनिन ने भारत की आज़ादी की लड़ाई का खुलेआम समर्थन किया था। तक़रीबन 17 अक्टूबर 1920 में जब भारतीय क्रांतिकारियों ने लेनिन के राह पर आंदोलन के लिए काबुल में मुलाक़ात की थी तो उसे लेनिन ने बजाप्ता समर्थन करते हुए लिखते (https://www.marxists.org/archive/lenin/works/1920/may/13b.htm) हैं कि 

‘मुझे यह सुनकर खुशी हुई कि उत्पीड़ित जातियों के लिए आत्मनिर्णय और विदेशी और देशी पूंजीपतियों के शोषण से मुक्ति के सिद्धांतों को, जिन्हें मजदूर-किसान जनतंत्र ने घोषित किया है, अपनी स्वतंत्रता के लिए वीरतापूर्वक लड़ रहे सचेत हिंदुस्तानियों के बीच इतना हार्दिक स्वागत प्राप्त हुआ है। रूस के मेहनकतश जनसाधारण हिंदुस्तानी मजदूरों और किसानों के जागरण का सतत ध्यानपूर्वक अवलोकन कर रहे हैं। सारे संसार के मेहनतकशों के साथ एकजुटता अंतिम विजय की गारंटी है। हम मुसलमान और गैर मुसलमान तत्वों की घनिष्ठ संघबद्धता का स्वागत करते हैं। जब हिंदुस्तानी, चीनी, कोरियाई, जापानी, फारसी, तुर्क मजदूर और किसान कंधे से कंधा मिलायेंगे और मुक्ति के एकसमान ध्येय के हेतु साथ-साथ आगे बढेंगे, केवल तभी शोषकों पर निर्णायक विजय सुनिश्चित होगी'।

लेनिन के भारतीय सहयोग की नीति को आगे बढ़ाते हुए लेनिन की मृत्यु के उपरांत सोवियत संघ ने भारत में भगत सिंह,चंद्रशेखर आज़ाद द्वारा बनाई गई पार्टी HSRA(हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी) के कार्यकर्ताओं को बम-हथियार आदि बनाने की ट्रेनिंग दी थी। भगत सिंह,सुखदेव, राजगुरु आदि नेता लेनिन के बड़े प्रशंसक थे तभी भगत सिंह अपने फाँसी के चंद क्षण पहले लेनिन की पुस्तक पढ़ रहे होते है। ध्यानाकर्षण तो इस बात को लेकर भी है कि मुकदमे के सुनवाई के दौरान 21 जनवरी को लेनिन दिवस था, मुँह पर लाल रुमाल बांधे हुए भगत सिंह,राजगुरु,सुखदेव ने अदालत के भीतर ‘समाजवादी क्रांति जिंदाबाद', 'कम्युनिस्ट इंटरनेशनल जिंदाबाद', ‘जनता जिंदाबाद,’ ‘लेनिन का नाम अमर रहेगा,’ और ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारे लगाए। 

ये अराजक मूर्तितोड़ तंत्र बालगंगाधर तिलक, भगत सिंह सुखदेव, राजगुरु आदि कालजयी महावीरों के उपासक होने का दावा करते हैं जबकि इन्हें लेनिनवादी विचार, लेनिन का व्यक्तित्व से नफ़रत है। नफ़रत का स्तर ये है कि लेनिन की धूल से आधी लिपि हुई मूर्ति भी बर्दाश्त नहीं हो पाई। यह विडंबना ही है कि भगत सिंह और लेनिन के विचारों से असहमति रखने वाले गाँधी भी लेनिन के मुरीद थे। गाँधी लेनिन के रसिया क्रांति के आलोचक होते हुए भी लेनिन के लिए लिखते हैं:- ‘लेनिन जैसे प्रौढ़ व्यक्ति ने अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया था, ऐसा महात्याग व्यर्थ नहीं जा सकता और उस त्याग की स्तुति हमेशा की जाएगी'। 

लेकिन यही दुर्भाग्य है इस दौर का कि विरोधों का कोई प्रामाणिक आयाम नहीं है। विरोध का कोई ठोस तथ्यात्मक तर्क भी नहीं है। केवल मानसिक कुंठा की जड़ताओं से ग्रसित है कि 'विरोध करना है'। ऐसे समय में बौद्धिक विमर्शों का क्या आयाम होगा और कितनी तादात उसका अनुसरण करेगी।।

Friday, March 23, 2018

भगत सिंह के फाँसी के लिए गाँधी-नेहरू के निष्ठा पर सवाल कब तक ?

23 मार्च भारत के तीन वीर सपूतों के बलिदान का दिवस है और आजाद भारत में समाजवाद के प्रबल प्रवर्तक और पंडित नेहरू के धुर विरोधी  डॉ राममनोहर लोहिया का जन्म दिवस भी है, लेकिन समाजवाद, बहुजनवाद तथा वामपंथी के संरक्षक इसे लोहिया के जन्मदिवस के तौर नहीं मनाते हैं। स्वयं डॉ लोहिया ने इस दिन को बलिदान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया था। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को इसी दिन लाहौर जेल में फांसी दी गई थी। समूचे देश में अंग्रेजों के विरुद्ध आक्रोश का उफान था। संयुक्त भारत के शहरों, कस्बों, गांवों में उनके बलिदान की ही चर्चा थी। लाहौर षड्यंत्र केस के दौरान अपने मुकदमों की पैरवी भगत सिंह स्वयं किया करते थे। यह बहस इतनी प्रसिद्ध और रोचक हो चली थी कि मोतीलाल नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, पंडित जवाहरलाल नेहरू और रफी अहमद किदवई जैसे सरीखे नेता भी कई अवसरों पर लाहौर कचहरी में दर्शक एवं श्रोता बन भगत सिंह को देखा और सुना करते थे। भारत नौजवान सभा का घोषणापत्र और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के समय-समय पर प्रकाशित दस्तावेज भगत सिंह और उनके साथियों की विचारधारा की स्पष्टता बयान करते हैं। वे न सिर्फ बलिदान, साहस और वीरता के प्रतीक थे बल्कि वे प्रखर समाजवादी और धार्मिक संकीर्णता के कट्टर विरोधी भी थे। 

भगतसिंह के अनुसार ‘‘समाज का वास्तविक पोषक श्रमजीवी है। जनता का प्रभुत्व मजदूरों का अंतिम भाग्य है। इन आदर्शों और विश्वास के लिए हम उन कष्टों का स्वागत करेंगे, जिनकी हमें सजा दी जाएगी। हम अपनी तरुणाई को इसी क्रांति की वेदी पर होम करने लाए हैं, क्योंकि इतने गौरवशाली उद्देश्य के लिए कोई भी बलिदान बहुत बड़ा नहीं है"। भगत सिंह के उस बलिदान और क्रांति के अलख के वजह से ही आज लोगों में सत्ता से सवाल पूछने का साहस जुटा पाता है।

लेकिन जब भी गाँधी-नेहरू की बात होती है भगत सिंह के संदर्भ में तो अक्सर लोग यह गाँधी-नेहरू के निष्ठा पर सवाल खड़ा कर देते हैं कि गाँधी-नेहरू ने भगत सिंह को बचाने की कोशिश नहीं की। ये दोनों चाहते तो भगत सिंह को बचाया जा सकता था लेकिन इन्होंने बचाने की चेष्टा नहीं की। और भी कई भ्रामक संदर्भ गिनाने लगते हैं। व्यस्त न होता हूँ तो सच्चाई से रूबरू करा देता हूँ लेकिन सामने वाले विचार में जड़ता देखता हूँ तो चेहरे पर मंद मुस्कान देकर शांत हो जाता हूं। बहरहाल आज गाँधी-नेहरू के भगत सिंह के फाँसी के संदर्भ में असल कोशिश और निष्ठा का वर्णन करूँगा ताकि आज हिमालय के भांति ऊँचे व्यक्तित्व के महापुरुषों को असल श्रद्धांजलि अर्पित कर सकूँ।

* सर्व प्रथम सुभाष चंद्र बोस के द्वारा संप्रेषित प्रमाण को प्रस्तुत करता हूँ। सुभाष चंद्र बोस ने अपनी पुस्तक 'भारत की स्वाधीनता' में लिखा है- "महात्मा जी ने भगत सिंह को फाँसी से बचाने की पूरी कोशिश की अंग्रेजों के गुप्तचर को पता चला कि यदि भगत सिंह को फांसी दे दी जाये तो उसके फलस्वरूप हिंसक आंदोलन उभरेगा, अहिंसक गांधी खुलकर हिंसक आंदोलन का पक्ष नहीं ले पाएंगे तो युवाओं में आक्रोश उभरेगा और वे कांग्रेस और गांधी से अलग हो जाएंगे।इसका असर भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को समाप्त कर देगा। लेकिन भारतीय जनता ने अंग्रेजी साम्राज्यवादी चाल को विफल कर दिया। हालांकि कुछ नवयुवकों ने आक्रोश में आकर काले झण्डों के साथ प्रदर्शन किया पर उसके बाद ही हिंसक आंदोलन का अंत हो गया था।" यह सच है अपनी ज़िंदगी में पहली बार गाँधी जी ने किसी व्यक्ति (भगत सिंह) के लिए सज़ा कम करने की माँग की थी, महात्मा ने स्वयं वाइसराय से मिलकर लिखित रूप में अपील की कि भगत सिंह की फाँसी रोक दी जाये। लेकिन समय से पहले ही करांची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन प्रारम्भ होने से से पहले ही फांसी देने का एक मात्र मकसद था गांधी के प्रति नवयुवकों में विद्रोह पैदा करना। 

भगत सिंह स्वयं फांसी के पूर्व अपने वकील से मिलने पर कहा था - मेरा बहुत-बहुत आभार पँ नेहरू और सुभाष बोस को कहियेगा ,जिन्होंने हमारी फाँसी रुकवाने के लिए इतने प्रयत्न किया।

*भगतसिंह के पिता सरदार किशन सिंह जी जिन्होंने 23 मार्च को अपना पुत्र खोया था 26 मार्च को कांग्रेस अधिवेशन में लोगों से अपील कर रहे थे- "आपलोगों को अपने जेनरल महात्मा जी का और सभी कांग्रेस नेताओं का साथ जरूर देनी चाहिए। तभी आप देश की आजादी प्राप्त करेंगे।इस पिता के उदगार के बाद पूरा पंडाल सिसकियों में डूब गया था। पँ नेहरू, पटेल, मालवीय जी के आँखों से आंसू गिर रहे थे। 

लेकिन भ्रामक भ्रांतियां फ़ैलाने वाले लोग असल बातों को छुपा कर देश के सामने गाँधी-नेहरू-बोस आदि नेताओं के निष्ठा पर ही प्रश्नवाचक चिन्ह लगा दिया कि उन्होंने भगत सिंह के फाँसी रोकने के लिए कुछ नहीं किया। लेकिन जब तक हम जैसे लोग रहेंगे तब तक हर भ्रामक तर्कों को वास्तविक तथ्यों से ख़ारिज करने की जुगत में डटे रहेंगे। और शायद यही असली सम्मान अर्पित करना होगा भगत सिंह को। भगत सिंह ने जिन्हें मारने के पूर्व भी सम्मानित तौर से धन्यवाद कहा था उनके नाम पर ही उन लोगों के निष्ठा पर कैसे सवाल कर सकते हैं।

Sunday, February 18, 2018

कश्मीर किसकी प्रतिबद्धता- नेहरू या पटेल

तमाम सुनियोजित कोशिशों और धारणाओं की देन है कि कश्मीर विवाद का नाम सुनते ही ज़हन में देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू के असफलता का प्रतिविम्ब उभरने लगता है। नागरिक सोच कर व्यथित हो उठते हैं कि काश उस विवाद पर समझौता का अवसर  देश के पहले गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल को मिला होता तो आज कश्मीर और पाक-अधिकृत कश्मीर भी भारत में ही होता। किन्तु मामला केवल उस व्यथित विचलन के कल्पना भर का नहीं है। बल्कि मामला इतिहास के सच्चे शोध और तथ्यात्मक संदर्भों को जानने की आवश्यकता का भी है। इतिहास का काल स्वर्णिम हो या भयावह किन्तु वह होता कालजयी ही है। कुछ विशेष वैचारिक परिधि के भीतरी लोग जिनकी ऐतिहासिक जानकारियां तथ्यहीन होती है लेकिन इतिहास के शोधार्थी होने का दावा भी करते है। दरअसल गलती उनके ऐतिहासिक बोध को लेकर नहीं है बल्कि गलती उनके उस आलस्यपन को लेकर जो उन्हें संदर्भ ग्रंथों के पृष्ठों को पलटने से रोकती है। इस कारण विमूढ़ों के अतार्किक तर्जुमाओं का अनुसरण करना ज्यादा मुनासिब समझते हैं। मसलन ऐसी कुटिल ज्ञान ही इन्हें कुपमंडूक का पात्र बना देती है।

इसी कश्मीर के समझौता बनाम विवाद के मसले पर एक तथ्यात्मक संदर्भ आपलोगों से साझा कर रहा हूँ। भाजपा नेता व भारतीय विदेश राज्यमंत्री एम.जे.अकबर  ने 1991 में एक पुस्तक लिखी है। पुस्तक का नाम है "कश्मीर बिहाइंड द वेल" जिसके पेज संख्या '95' पर उन्होंने लिखा है-

"पटेल और नेहरू में कश्मीर को लेकर महत्वपूर्ण मतभेद था। पटेल साम्प्रदायिक विभाजन के मद्देनजर मानसिक रूप से कश्मीर को भारत में शामिल करने का विचार त्याग चुके थे। लेकिन शेर ए कश्मीर 'शेख अब्दुल्ला' के कारण पंडित जवाहरलाल नेहरू कश्मीर को भारत में शामिल करने के लिए ऐड़ी-चोटी एक कर चुके थे"।

इस पुस्तक के लेखक M.J AKBAR मौजूदा वक़्त में भाजपा दल से राज्यसभा सांसद हैं। भारत के केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री भी हैं। उन्होंने तक़रीबन 10 पुस्तकें लिखी है। राष्ट्रीय से लेकर अंतराष्ट्रीय अखबारों के वरिष्ठतम अथवा संपादक पद पर पत्रकारिता किया है। उन्होंने पुस्तक में तथ्यों और तर्कों को बजाप्ता संदर्भों के साथ चिन्हित किया है। लिहाज़ा यदि उनके उपर्युक्त संप्रेषित तथ्यों पर ऐतबार किया जात है तो क्या उनके पार्टी के  विचारक उनके तथ्यों को सही मानेंगे। क्या वो लोग कश्मीर विवाद के ठीकरा को नेहरू पर फोड़ने से बचेंगे या फिर अभी भी पटेल को समझौता न करने देने के मलाल से नेहरू को ही कोसेंगे। इस अंतर्विरोध और द्वैदात्मक चयन के क्या मायने निकाले जाएं।

Saturday, February 3, 2018

'अंतर्धार्मिक प्रेम के शिकार' अंकित से माफ़ीनामा पत्र ।

प्रिय अंकित,

ज़रा सी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूँ कि तुम्हारे मरणोपरांत तुम्हें माफ़ीनामा लिख सकूँ। लेकिन फिर भी हिम्मत जुटा कर लिख रहा हूँ जिसके ज़रिये तुम से माफी मांग पाऊँ। तुम्हारे चले जाने के अपराधबोध के कशमकश में अजीबोगरीब घुटन महसूस कर रहा हूँ। तुमसे माफी माँगने के लिए बेचैन हूँ। माफ़ी इसलिए माँग रहा हूँ, क्योंकि हमने तुम्हें एक ऐसा समाज दिया जहाँ मोहब्बत करने की स्वतंत्रता तक नहीं है। मानवनिर्मित धर्म और जाति के छद्म गुरुर ने प्राकृतिक प्रेम के स्नेह को बर्दाश्त नहीं कर सका। इसलिए धार्मिकता और जातीयता के इस छद्म गौरव ने आज तुम्हें भी लील लिया। दरअसल अंकित तुम जैसे कई लोग इश्क़ के ज़रिए इस वर्गीकृत समाज को चुनौती देता है। किन्तु धर्म और जाति का झूठा दंभकारी मानसिकता तुम जैसे निरीह प्रेम के उपासकों को मार देता है। अंकित यह हत्या केवल तुम्हारी नहीं हुई है, बल्कि यह हत्या उस स्वप्न की है जो तुम जैसे अनेकों युवा जाति और धर्म के झूठे आडंबर के खांचों से बाहर निकल कर अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह करते है। व्यथित इस बात को लेकर भी हूँ कि क्या ऐसी मज़हबी मगरूरियत हमारे समाज के भीतर सहिष्णुता और एकता को पनपने देगी। क्या यह संभव है कि मोहब्बत करने से पहले प्रेमी-प्रेयसी जाति,धर्म,गोत्र आदि पर आपसी तालमेल कर मोहब्बत की नुमाईश कर सके। मोहब्बत तो केवल वक़्त की साज़िश है जो न जाने कब हमारे भीतर एक अपनेपन का एहसास भर देती है और हमें पता भी नहीं चलता। उस साज़िश का अंतिम परिणाम अपने मोहब्बत  को पाने के जुनून में तब्दील हो जाता है। लेकिन जाने क्यूँ मोहब्बत का यह निरीह एहसास उस मगरूरियत समाज को खटकने लगता है। जिसकी कीमत अंकित तुम्हारे जैसे युवा को अपने मौत से चुकाना पड़ता है। जब से तुम्हारे मौत के कारण को जाना हूँ तब से स्तब्ध हो गया हूँ। ज़हन में तुम्हारे हत्या की काल्पनिक तस्वीर निरंतर परेशान कर रही है। तुम्हारे माँ की हालात को देख भावुकता से बेचैन हो गया हूँ। यह सोचकर रोंगटे खड़े हो रहे है कि उस वक़्त उस माँ की स्थिति क्या होगी। उनके जीवन का वह भयावह क्षण कितनी अतिरेकपूर्ण उनके जीवन के उम्मीद को खत्म कर रहा होगा।
अंकित हम तुम्हारे गुनहगार है। हमने तुम्हें वो समाज नहीं दिया जहाँ तुम अपनी मर्ज़ी से इश्क़ कर सको। लेकिन सीने पर इस अपराधबोध के साथ भी गुज़ारिश करता हूँ कि तुम अगले जन्म में आकर इस धरती पर मोहब्बत के एक नए इबारत को लिखना। जिससे समाज में प्रेम के उपासकों का एतबार बना रहे। इस पृथ्वी पर प्रेम की बहुत कमी है अंकित। और इस प्रेम को तुम जैसे हिम्मती लोग ही पृथ्वी पर भर सकते है। क्योंकि मोहब्बत करने वाला बागी होता है और वो समाज के विमूढ़ परंपरा को चुनौती देकर उस घृणित मानसिकता के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत करता है। तुम तो जीवित ही मोहब्बत फैलाने वाले एक सफ़ल अनुयायी साबित हुए। अगले जन्म तुम फिर मोहब्बत के अनुयायी बनकर ही आना। हमलोग कोशिश करेंगे कि शायद कुछ प्रतिशत इस घृणित सोच को कम कर सके।

तुम्हें एक स्वतंत्र समाज न देने वाला एक अपराधबोधि।।

Monday, January 8, 2018

पत्रकारों और लेखकों पर हुक़ूमती एफआईआर क्या अभिव्यक्ति और फासीवाद की टकराहट है !

पहले भी कई बार लिख चुका हूँ आज पुनः उसे दोहराना चाहता हूं कि मरना केवल श्मशान में जलना या कब्र में दफन होना नहीं होता है, बल्कि मरना वो क्रिया भी है जिस क्षण आप डर से लिखना, बोलना और सोचना छोड़ देते हैं। द ट्रिब्यून नाम के एक अंग्रेज़ी अखबार की रिपोर्टर एक खबर में लिखती हैं कि देश के नागरिकों का आधार डाटा 500 रुपये में बेचा जा रहा है। इस पर UIDAI नाम की सरकारी संस्था ने उस रिपोर्टर के अलावा तीन और लोगों पर एफआईआर दर्ज करवा दी है। कुछ विशेष विचारधारा के बौद्धिक गुलाम उस रिपोर्टर पर एजेंडा पत्रकारिता का आरोप भी लगा रहे हैं। किसी पर भी आरोप-प्रत्यारोप लगाना लोकतांत्रिक देश में अनैतिक नहीं है, लेकिन विषय को विषयांतर करना निश्चित रूप से एक अनैतिक साज़िश है। खैर, अब मुख्य विषय पर आता हूं। पत्रकारों पर केस दर्ज़ करने का मामला यह नया नहीं है, आधार से ही जुड़े मामले में इस संस्था ने मार्च 2017 में CNN-NEWS18 के एक पत्रकार पर केस दर्ज किया। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी रिपोर्ट का खुलासा करने पर पत्रकारों पर केस करना न्यायसंगत है? क्या किसी सरकारी संस्था अथवा सत्तारूढ़ लोगों की पारदर्शिता पर सवाल उठाना ईशनिंदा से भी अधिक गंभीर और संवेदनशील विषय है? फिर अगर पत्रकार संस्थानों की स्वायत्तता और पारदर्शिता पर सवाल नहीं उठाएगा तो क्या पत्रकारिता का बुनियादी अस्तित्व भी बचेगा? जब हुकूमत अपने अनुयाई संस्थानों से पत्रकारिता को नष्ट करने या अपने आगे नतमस्तक होने का ही विकल्प रखे तो देश का लोकतंत्र किसके भरोसे जीवित रहेगा? पत्रकारों के पास कोई विशेष अधिकार नहीं होता है। पत्रकार भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत ही सवाल करते है और संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के उपखंड क और ख उनकी भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं। संविधान निर्माण के समय सेंट्रल हॉल में पत्रकारों को विशेषाधिकार देने की बात कही गयी थी। तब की प्रारूप समिति के अध्यक्ष बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि पत्रकारों को विशेष अधिकार देना नुकसानदेह होगा, क्योंकि हमारे संविधान में अनुच्छेद 19 (1) (क )में दर्ज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर नागरिक को यह लोकतांत्रिक अधिकार देती है। लेकिन जिस तरह से पत्रकारिता के आवाज़ को दबाया जा रहा है और पत्रकारों को एफआईआर के ज़रिये डराया जा रहा है, वह देश के नागरिकों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण क्षण की शुरुआत है। इसे निश्चित रूप से फासीवाद का आहट माना जा सकता है। मेरी उन सामाजिक चिंतकों, लेखकों, साहित्यकारों, कलाकारों और पत्रकारों से गुज़ारिश है कि हुकूमत की इन प्रवृत्तियों का विरोध करें जो सत्ता के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले को कुचलने की कोशिश करती हैं। कुछ बौद्धिक गुलाम आपको यह भी तर्क देंगे कि सरकार अथवा उनके संस्थान आप पर झूठा केस दर्ज कर रहे हैं तो कोर्ट में आप अपना सही पक्ष रखिये, इसमें इतना चिल्लम-चोट क्यों किया जा रहा है? तो ऐसे लोगों को मेरा यही जवाब है कि क्या एक अदने से पत्रकार अथवा लेखक की यह हैसियत है कि वह अपने ऊपर लगाए गए आरोपों का जवाब देने के लिए किसी वकील अथवा न्यायिक प्रक्रिया के खर्च का आर्थिक बोझ उठा सके? वो न्यायालय में ही अपना वक्त और पैसा खर्च करता रहेगा तो अपने घर-परिवार का खर्च कब और कैसे उठाएगा? सरकार के पास तो सरकारी खजाना, वकील और अटॉर्नी जनरल भी हैं, लेकिन एक पत्रकार के पास क्या है? इसलिए जो वर्ग साहित्यिक लेखन, सामाजिक चिंतन अथवा पत्रकारिता करने आए हैं, वो इस अभिव्यक्ति के कुचलने की प्रवृत्ति के खिलाफ आवाज़ उठाएं और जो केवल ग्लैमर या चकाचौंध से आकर्षित होकर आए हैं, उनसे क्या अपेक्षा करना। वो तो चकाचौंध की तलब में सत्ता के आगे बिछने को तैयार बैठे ही होंगे। लेकिन देश के नागरिकों के लिए सोचने का वक्त आ गया है, वह इस फासीवादी आहट को सुनने की कोशिश करें। क्योंकि फासीवाद कभी ढ़ोल-नगाड़े बजा कर नहीं आता है बल्कि इन्हीं दमनकारी प्रवृत्तियों के ज़रिये मुल्क में प्रवेश करता है और फ़ासीवादी विचारधाराओं का विस्तारीकरण करता है।