बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों पर विशेष करके लड़कियों पर हस्तास्त्र हमला करना महज़ एक अराजकता को दबाने की प्रशासनिक कार्यवाही भर नहीं है बल्कि वह असल मायनों में फांसीवादी के निरंतर विस्तृत होते दायरों का उत्सव है। याद रखें फांसीवाद सर्वप्रथम लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त करता है और उसके उपरांत मानवीय अनुशीलन को आतुरतापूर्वक खा जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमतियों को डंडे के दम पर ख़त्म नहीं किया जाता है। बल्कि उस डंडे की चोट एक अराजक व निर्भीक कौम को जन्म देती है जिससे लोकतांत्रिक शुचिता कमज़ोर पड़ती है किंतु जनसंवेदना अथाह प्राप्त होता है। नवरात्र का दिन चल रहा है और सनातनी मंत्र का उच्चारण भी अक्सर किया जाता है 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता' अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता विराजते है। फिर अचानक इस माँ दुर्गा वाले नवरात्रि माह में महिलाओं पर संवेदनहीन हमला करना कितना उत्साहवर्धक है समाज के लिए। शर्म तो इस बात का है कि उन लड़कियों पर हमला PAC के पुरुष जवान ने महिला छात्रावास में घुस कर किया है। इसे एक संवैधानिक व लोकतांत्रिक देश में अराजकता का नंगा नाच कहा जा सकता है। महिला छात्रों के लिंगभेदी उन्मूलन का प्रतिवाद महिला छात्रों के प्रतिकूल बन गया। परंतु निश्चित रूप से यह प्रशासनिक हमला आंदोलन को और तठस्थ बना गयी। यह प्रदर्शन महिलाओं के अस्मिता व विश्वविद्यालय के समाजिक समानता को लेकर है मसलन इस पर वामपंथी, कांग्रेसी अथवा भाजपाई के छात्र राजनीति की दृष्टि से निर्णय लेने से बचें। विचार कर लें, इंसान के अस्तित्व व सम्मान से अधिक दल का अभिवंदन संभव नहीं है। यह प्रदर्शन एक महिला होने के बुनियादी सुविधाओं के नैतिक अधिकार का मांग है। यह महिला छात्र के आत्मसम्मान का नैसर्गिक मांग है। यह लिंगभेदी सभ्यता को नष्ट करने का शंखनाद है। महिला छात्रावास के खिड़कियों के सामने पुरुषों के द्वारा अश्लील नुमाईश की बेशर्म घटनाओं का भी विरोध प्रदर्शन है। छोटे कर्मी से लेकर बड़े अधिकारी व छात्र तक विश्वविद्यालय की छात्रा एवं उनके छात्रवास के समक्ष ऐसी हरकत करते है जिसे एक पिता अथवा एक परिवार के लिए नैतिक शर्म का सबब बन जाएगा कि हमने अपने घर में एक बच्ची को क्यों जन्म लेने दिया,जब हम उसे सामाजिक सम्मान नहीं दे सकते, जब हम उसके लिये एक सुरक्षित समाज नहीं दे सकते है। सरेआम लड़कियों के ऊपर लाठी,डंडा से हमला कराया गया। रबर के गोले दागे गए। और हद तो तब हो गया जब इस भयानक हमला के बाद सारी रात हॉस्टल की बिजली काट दी गयी। आप कल्पना करें। आज यह एक विश्वविद्यालय में किसी दूसरे की बहन-बेटियों के साथ घटा है लेकिन कल को इस बात की क्या गारंटी है कि यह घटना आपके परिवार के किसी बच्ची के साथ किसी संस्थान में नहीं घटेगी। किन्तु इस बात की गारंटी है कि यदि आज आप ऐसी व्यवस्था व ऐसे कलुषित मानसिकता वाले समाज का प्रतिकार अथवा बहिष्कार करते है तो शायद आने वाले वक्त में हमारी बहन-बेटियाँ महफ़ूज़ रह सकती है। अमन-चैन के साथ बेहिचक कहीं भी पढ़ने अथवा अन्य कार्य के लिए परिवार से दूर जा सकती है। मसलन इस चारित्रिक भ्रष्टतंत्र के खिलाफ़ आज आप सभी लोगों को आवाज़ उठानी पड़ेगी।।
Wednesday, September 27, 2017
Friday, August 11, 2017
पहलाज निहलानी को खुला ख़त....
पूज्यवर पहलाज निहलानी जी,
सादर संस्कारी दण्डवत प्रणाम आपको।
भारत के तमाम संस्कृतियों व संस्कारों के विलुप्त होने की परंपरा में आज देश ने आपके जैसे एक बहुत बड़े संस्कारी व्यक्ति के विलुप्त होने का काला दिवस मना रहा है। दरअसल जब से मैंने सुना कि भारतीय संस्कार के प्रबल प्रवर्तक पहलाज निहलानी को केंद्रीय फ़िल्म प्रमाण बोर्ड से निकाल दिया गया तब से हृदय की धड़कन का कंपन्न तीव्र हो गया है। पूरे कमरे के भीतर मनहूसियत सा महसूस कर रहा हूँ। कमरे के भीतर टंगी मार्यादा पुरुषोत्तम राम की तस्वीर देख रहा हूँ। आप 21वीं सदी के दूसरे दशक में भारतीय संस्कृति एवं संस्कार को स्थापित करने वाले पहले महावीर थे। आपके भीतर नैतिकता का वो प्रशांत महासागर था जो किसी भी कीमत पर भारतीय संस्कार को क्षति नहीं पहुंचने देता था। आपने जेम्स बांड से लेकर कितनों तक को भारतीय संस्कार में रंगने के लिए बाध्य कर दिया था। आखिर में जाते-जाते मधुर भंडारकर के फ़िल्म से लेकर नवाज़ुद्दीन के फ़िल्म तक में 40 कट लगाकर संस्कारों से भर दिया। आपके इस संस्कार प्रेमी होने के चरित्र का मैं फैन हो गया था। कई घण्टों तक मैं पशोपेश में रहता था कि आप किस मंत्र का जाप करके फ़िल्म को संस्कारवान बनाने के जुगत में लग जाते थे। आपके इस संस्कृतिक संस्कार का राज़ सुंदरकांड था या हनुमान चालीसा मैं यही सोचता रहता था। यह जानने के लिए मैंने आपके कई इंटरव्यू को देखा और पढ़ा किन्तु भीतर की उत्सुकता को शांत करने में असफल रहा। हालांकि शुरुआत में मुझे ऐसा लगता था कि आपने ही सभी प्रकार के भारतीय संस्कृतियों को बचाने का ज़िम्मा क्यों ले लिया है। क्या भारत की जनता इतना संसाधन विहीन है कि आपके संस्कारवान फ़िल्म दिखाने पर वो अश्लील और संस्कृति शत्रु फ़िल्म नहीं देखेंगे। आपके पास कई प्रकार के प्रमाण पत्र होता है लेकिन आप A(वयस्क) प्रमाण पत्र देने से पहले भी उस फ़िल्म को U(अप्रतिबंधित सार्वजनिक प्रदर्शनी) बना कर ही A प्रमाण पत्र देते थे। मैं भीतर से क्रोधित भी होता था कि आप वयस्क फ़िल्म को A सर्टिफिकेट दे तथा अन्य श्रेणी के फ़िल्म को उसी आधार पर सर्टिफिकेट दें। यह भारत की जनता स्वतः तय कर लेगी कि उसे क्या देखना है और क्या नहीं। यह विडंबना भी लगता था कि जिस देश के भीतर लाखों अश्लील फिल्मों(पोर्न साइट्स) का मंच उपलब्ध है वहाँ आपका जबरन कान पकड़कर संस्कारी बनाना कितना सार्थक है। लेकिन मैंने अन्ततः तय कर लिया कि किसी भी प्रकार का कुंठा स्वयं के भीतर पालन स्वयं के स्वास्थ्य को क्षति पहुंचाने के अलावा और कुछ नहीं है। क्योंकि इसका परिणाम मैंने FTII के प्रतिरोध में देखा था। इसलिए मैं देश के असल संस्कृति जो विरासत में मिला था "बेचारा" बने रहने वाला लिबास। उसी बेचारा वाला नाव के सहारे आपके जबरन कॉलर पकड़ कर संस्कारी बनाने वाले मुहिम में शामिल होकर वैतरणी पार कर लिया। लेकिन दिल में एक कड़वी कसक रहती थी कि काश आप हर उस अश्लीलता को खत्म कर देते जिसे लोग पूर्वर्ती कालों में प्राकृतिक कर्म के नाम पर कामदेव के साहित्य की अर्चना करते थे। लेकिन जब मैंने आपके निर्देशित फिल्मों में से आँखें, शोला और शबनम आदि को देखा तो मुझे लगा कि उस दौर में आपका संस्कार मर्यादित नहीं था अथवा तब संस्कारी प्रवृत्ति वाले चेयरमैन की प्रजाति ही विलुप्त होगी। लेकिन आपके इस हश्र का अंदाज़ा मैंने उस वक़्त लगा लिया था जब देश के भीतर देखा कि यह 'संस्कृति सुरक्षा योजना' तो वैलिडिटी पीरियड वाला है। उसी वक़्त सोचा था कि आपके संस्कारी कुर्सी का भी वैधता केवल संस्कारी होने के आखरी खुराक तक ही है। खैर, यह मेरी अभिलाषा है कि आप आजीवन संस्कारी बन कर संस्कार का मंद शीतल बयार फैलाते रहें। लेकिन अंत मे आपसे एक गुज़ारिश भी है कि कृपया करके आप पद मुक्ति के बाद अपने आँखे फ़िल्म के डाइरेक्टर वाले संस्कार में न प्रवेश कर जाइएगा, अन्यथा देश सदियों तक किसी संस्कारी पर विश्वास नहीं करेगा।
धन्यवाद।।
आपका एक प्रशंसक
प्रेरित कुमार। 🙏
Thursday, August 3, 2017
गरीबी का दुश्मन है शिक्षा का व्यवसायीकरण।
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Monday, July 3, 2017
भीड़ के हाथों दम तोड़ता भारतीय लोकतंत्र !
मुल्क में चारो तरफ एक हिंसक हत्यारी भीड़ का शोर बह रहा है। उस शोर का सैलाब लगातार आपके कल्पनाशीलता को खत्म कर रहा है। आपके भीतर के रचनात्मकता को पिट-पिट कर मार रहा है। वो हत्यारी भीड़ संवैधानिक व्यवस्था के समानांतर खड़ी होकर लोकतंत्र को कुचल रही है। लेकिन आपको सनद रहे कि भीड़ न तो किसी मजहब की होती है और न किसी जाति की। लेकिन फिर भी ये हत्यारी भीड़ हमेशा किसी धर्म या मज़हब का होने का दावा करती है। ये भीड़ हमेशा संस्कृति, मजहब, राष्ट्र आदि बचाने के नाम पर हमला करती है। दरअसल ये हत्यारी भीड़ ऐसा इसलिए करती है ताकि उस समाज के लोग उसके समर्थन में खड़े हो सकें। लेकिन वास्तविक रुप से ये भीड़ एक वैचारिक ज़हर के खेत में उगा वह मानसिक हिंसा का फसल है,जिसका एक ही उद्देश्य होता है अपने वैचारिक दल को सत्ता तक फायदा पहुंचाना और लोगों को अन्य बुनियादी मुद्दों से भटका कर अपने आका के प्रति सच्ची निष्ठा दिखाना। यह भीड़ न तो कहीं बाहर से आती है और न ही वो मरने वाला भीड़ का शिकार। लेकिन दुर्भाग्य से इस साज़िश को न तो हमारे मुल्क़ के नागरिक समझ पा रहे हैं और न ही ये हिंसक दल किसी को समझने देना चाहती है। इन साजिशों की विडंबना देखिये कि एक तरफ वो हत्यारी हिंसक भीड़ भी हमारे बीच से ही इकट्ठा कर रहे हैं और उसका शिकार भी हमारे बीच से ही चुन रहे हैं। दूसरी ओर वो नैतिकता का तक़ाज़ा दिखाकर हम सब के बीच लोकतंत्र का भ्रम भी बनाए रखते हैं। मसलन भीड़ अपना शिकार कभी आलोचना या समीक्षा का विरोधाभास खड़ा करने वाले को चुनती है अथवा किसी को केवल संशय के आधार पर शिकार बनाती है। इन दोनों अवस्था में हमारे आसपास की टहलती भीड़ उस व्यक्ति को मार देती है। ये भीड़ रविंद्र को भी मारती है, यही भीड़ पहलू खान, जुनैद, अख़लाक़ को भी मारती है। यही भीड़ झारखंड के शोभापुर गांव में बच्चा चोरी के नाम पर नईम,हलीम और सज्ज़ाद को भी मारती है। यही हत्यारी भीड़ झारखंड में एक 80 वर्ष की बूढ़ी दादी के सामने उसके पोता उत्तम, गौतम और विकास को भी मारती है। वो हत्यारी भीड़ पश्चिम बंगाल के इस्लामपुर में पशु चोर के नाम पर समीरुद्दीन, नसीरुल, और नारिस को भी घेर कर मारती है। यही भीड़ तमिलनाडु के करुपैया और एन अरविंद को भी धायल करती है। यही हत्यारी भीड़ कश्मीर में डीएसपी अय्यूब पंडित को भी मारती है और यही भीड़ आर्मी अधिकारी उमर फैयाज़ को भी मारती है। यही भीड़ आगरा में अरुण माहौर को भी दिनदहाड़े गोली से मारती है और यही भीड़ दिल्ली में डॉ पंकज नारंग को घर से खींच कर मारती है। इन सभी घटनाओं में से भीड़ ने न तो किसी को धर्म के नाम पर बख़्शा है और न ही मज़हब के नाम पर। इसलिए हम भारतीयों को इसे धर्म,मज़हब का नुमाइंदा न बनाकर एक हिंसक दरिंदा के रूप में चिन्हित करना चाहिए। अन्यथा वो हत्यारे उन धर्म व मज़हब के पवित्र छांव में खुद को छिपा कर बच जाएगा। खैर, एक बात जो सोचने वाली है कि आखिर यह भीड़ किन लोगों के इकाइयों से इकट्ठा होकर बनती है। भीड़ के हत्यारा सदस्य बनने की पात्रता क्या है। इस भीड़ वाले समूह को कौन उकसाता है। यह भीड़ किसके इशारों पर हमला करती है। क्या हमारे साथ पढ़ने वाला, काम करने वाला, मोहल्ले का पड़ोसी आदि भी कोई उस भीड़ में शामिल रहता है। यदि उस भीड़ में शामिल हमारे देश के नागरिक ही होते हैं तो सबसे भयावह सवाल है कि क्या हम ऐसे हत्यारों के बीच में खुद को कभी महफ़ूज़ पाएंगे। अब नैतिक रूप से आप स्वयं आत्मनिरीक्षण करते हुए याद करने की कोशिश करिये कि आपने इस हत्यारी भीड़ को बनाने, उकसाने में कितना सहयोग किया है। आपने मैसेज़ के ज़रिए कितने लोगों के भीतर हत्या का फसल बोया है। आपने व्हाटसअप और फेसबुक पर ऐसे कितने मैसेजों को शेयर किया है, जो आपको जाती, मज़हब, राजनीतिक विरोधी, बच्चा चोरी, आदि का वास्ता देकर बाध्य करती है आगे फॉरवर्ड करने के लिए। आपने कब-कब उन उन्माद वाली अफवाहों को फैलाया है जो आपके संस्कृति को बचाने का दावा करती है और उसके विरोधी को मारने के लिए मजबूर करती है। दरअसल हम और आप जानबूझकर या अनजाने में ही सही लेकिन इस भीड़ को हमारे इन्हीं करामातों ने जन्म दिया है। फिर भी अगर आप इस भीड़ और हत्या को देखर विचलित नहीं हो रहे है तो यकीन कीजिये कि यह आपके लिए भयावह भविष्य का आगाज़ हो रहा हैं।आप उस हत्यारी भीड़ के हत्या को देखकर केवल अपने आप को साक्षी मान रहे हैं तो दरअसल आप गफ़लत में जी रहे हैं। क्योंकि आप भी उसी शिकार के कतार में खड़े हैं। तय मानिये आप या आपका परिवार भी उसी रेलगाड़ी से सफ़र करेगा। वो भी दिन या रात में उसी शहर, उसी बाज़ार और उन्हीं भीड़ के बीच से गुजरेगा। हालांकि ऐसा न हो लेकिन यदि उस भीड़ को आप या आपके परिवार में से किसी पर शक हो गया तो उसका अंजाम कितना डरावना हो सकता है। इसलिए अगर आपने वक़्त रहते उन हत्यारी भीड़ के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद नहीं की तो वो भीड़ एक दिन आपके परिवार और बच्चों को भी उसी सफर में अपना शिकार बनाएगी। और अंत में एक दिन आप भी उस भीड़ के शिकार बनेंगे। इस हत्यारी भीड़ से बचने का कोई भी प्राकृतिक रास्ता नहीं है। न तो आप धर्म,जाती और गोत्र के आधार पर बच सकते हैं और न ही आप वैचारिक सहयोग के आधार पर। ये भीड़ किसी को भी नहीं बख्शेगी। जिस तरह शरीर को भोजन न मिलने पर शरीर धीरे-धीरे स्वंय को खाते हुए मनुष्य को कमज़ोर करके नष्ट करता है ठीक उसी प्रकार जब उस भीड़ को कोई शिकार नहीं मिलेगा तो अपने आसपास के लोगों को ही मारेगी और एक वक्त ऐसा भी आएगा कि वो अपने भीड़ से निकाल कर एक-एक करके सब को खत्म कर देगी। आप सोचिये कि वह कल्पना कितनी भयावह होगी जब वो हत्यारी भीड़ आपके अपने,सगे-सम्बंधी को अपना शिकार बनाएगी। मसलन अभी भी अधिक वक़्त नहीं गुज़रा है। आप आज से ही यह प्रण ले कि आप किसी भी अफ़वाह को शेयर फॉरवर्ड नहीं करेंगे और लोगों को ऐसा करने से रोकेंगे। यदि कोई आपको मैसेज या निजी रूप से मिलकर आपको आपके संस्कृति, देश, धर्म, मज़हब, जिहाद आदि के ऊपर ख़तरा बताकर आपको जागने के लिए कहे तो ऐसे लोगों को पहले मानसिक तौर पर जागरूक करने की कोशिश कीजिये और उन्हें वास्तविक बुनियादी बातों से रूबरू कराइये। लेकिन फिर भी यदि उस बौद्धिक ज़हर से मुक्त नहीं होना चाहते हैं तो उनसे तुरंत सभी प्रकार के सम्बंध को समाप्त कर स्वयं और समाज पर उपकार लें।
अभी सुप्रीम कोर्ट ने भी मॉब लिंचिंग को लेकर अपना कड़ा रुख अख्तियार करते हुए केंद्र सरकार से कानून बनाने की मांग की है। मतलब इस खतरे की चुनौती अब सर्वोच्च न्यायालय के दीवार के भीतर पहुँच चुकी है। इसे लोकतंत्र के जड़ में मट्ठा समझा जाने लगा है।
नये पिढ़ी के पत्रकारों की अकांक्षा और संर्घष की वास्तविकता।
बुद्ध, महावीर और गाँधी के देश में हिटलर आदर्श नहीं हो सकता...
अर्थात विरोध हो रहा था लेकिन बिलकुल न के बराबर। लोग इसे सामान्य और स्वभाविक मान के चल रहे थे। मसलन एक जातिय हिंसा (ethnic violence)और लोकतांत्रिक संविधान (Democratic constitution) के पतन को जब लोग सामान्य रुप से स्वीकार करने लगते है तो उससे फासिज्म के स्वीकार की भूमिका बनती है। जो भविष्य में उस मुल्क के इतिहास की गणणा अभिशाप के रुप में की जाती है। लिहाजा नागरीकों को यह सनद रहे कि फासिस्ट तानाशाही और दुसरी तानाशाही में फर्क होता है। फासिज्म में हमेशा स्वतत आंतरिक शत्रु (Internal enemy) की कल्पना की जाती है। आपको महसुस कराते है कि आपके देश के भीतर एक ऐसी संस्कृति और समाज के विशेष लोग है जिससे ये सारी समस्या की उत्पत्ति हो रही है। जैसे जर्मनी में यहूदियों को बनाया गया। हालांकि भारत में किसी को हिटलर या फ़ासिस्ट कहना बिल्कुल गलत बात है।आज भारत की संस्कृतियां विविध भले ही है किंतु लोकतांत्रिक चेतना इतनी जगी है कि यह संभव नहीं है। इसलिए बात को इतनी अतिशयोक्ति नहीं करनी चाहिए कि वह गलत युक्ति में तब्दील हो जाए। इन तमाम मसलों के बाद भी हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना है कि हमने तीन खाँचे तय किये है। लेफ्ट, राइट, और सेंटर। हम हर राजनैतिक दल को जबरन इन्हीं तीनों में से किसी मे घुसेड़ने की कोशिश करते है। हम हर नागरिक के विचार,प्रश्न, सिद्धान्त आदि को इन्हीं के खाँचों में जबरन डालते है। जो परिणामस्वरूप हमेशा परेशानी पैदा करती है और हमारा बुनियादी विमर्श केंद्र बिंदु से भटक जाता है। बहरहाल आपलोग भी हिटलर को विशेष रूप से पढिये और अपने आसपास नवजात हिटलर को फ़ासिस्ट हिटलर बनने से रोकिये। क्योंकि हिटलर भी एक अयोग्य सैन्यकर्मी था और देश के भीतर व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी वाला हिंसक भीड़ भी एक अयोग्य बेरोजगार है। सांस्कृतिक विविधता हिटलर को भी स्वीकार्य नहीं था और सांस्कृतिक विविधता इन हिंसक भीड़ वाले लफंगों को भी नहीं स्वीकार्य है।ऐसी अनेकों समानता नरकीय हिटलर और अशिक्षित बेरोजगार हिंसक भीड़ के बीच पाई जाती है। इसलिए संभल के रहिये और अपने अर्जित ज्ञान को लोगों से साझा करके उन्हें भी हिटलर बनने से रोकिये।
Friday, June 16, 2017
तब समझिये की देश में सबकुछ ठीक नहीं है।
जब लोकतंत्र की अपेक्षा उदासीनता में तब्दील हो जाए। देश की जन प्रसन्नता विपन्नता में डूब जाए। सामरिक संवाद शोर तले दब जाए। वैचारिक असहमति हिंसक विरोध के मार्फ़त जताया जाए। संस्थानिक स्वाययत्ता सत्ता के आगे नतमस्तक हो जाए। आयोग के चुनावी एलान पर राजनैतिक दल सक्रिय हो जाए। और हर विचार को राष्ट्रवाद के कसौटी पर मापा जाए तो समझिए कि सबकुछ ठीक नहीं है। जहाँ अस्पताल में दम तोड़ने पर एक मां को पति अपने कांधे पर शिथिल ठंडे लोथड़े लिए पैसे के आभाव में आठ किलोमीटर पैदल चले। जहां सरकारी हड़ताल के तले एक बहु अपने ससुर के कांधे पर दम तोड़ दे। अस्पताल की लंबी कतारों में पर्ची लेते समय एक दस साल की बच्ची अपने बाप के गोद में दम तोड़ दे। जहां हर पांच घंटे में एक किसान आत्महत्या करे। जहां एक चौथाई आबादी रात को भूखा सोने पर मजबूर हो जाए वहाँ यदि हज़ारो करोड़ रुपये इतिहास के नायक को ठोस भौतिक प्रतिमा के अमरत्व से जड़ने में खर्च किया जाए तो एकबार फिर से सोचिये की देश में सबकुछ ठीक नहीं है। जब सरकार के किसी नीति के तर्कसंगत समीक्षक के आलोचनात्मक समीक्षा पर उस समीक्षक को कुछ सोशली अराजकों के द्वारा अश्लील शब्दों से श्रद्धा अर्पित किया जाने लगे और उसकी जाति, धर्म, परिवार, खानदान आदि पर अश्लील छींटाकशी कर उसके अकादमिक योग्य को कोसा जाने लगे तो इस बार ठंडे दिमाग से सोचिये कि लोकतांत्रिक रूप से सबकुछ ठीक नहीं है। जब बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, बिजली, पानी, किसानों के कयामत आदि जैसे देश के मूल गूढ़ प्रश्न पर बहस न होकर सेना, पाकिस्तान, गाय, राष्ट्रद्रोही, पाकिस्तानी एजेंट आदि जैसे सामान्य विषयों को अति गम्भीरता के साथ समाज में तनावग्रस्त विमर्श विचरण करने लगे तब अब यह मत समझिये कि सबकुछ ठीक नहीं है बल्कि अब आप यह समझिये कि अब निजी रूप से आप और आपके परिवार का तेज गति के साथ आरामदायक क्षेत्र से विस्थापन होने जा रहा है। और एक विनाशकारी क्षण आपके लिए हिंसा के कोख में जन्म लेने को छटपटा रहा है। अगर इतना पढ़कर समझने के बाद भी आपके चेहरे पर शिकन और ललाट तनाव से नहीं तना है तो आप मान के चलिए कि या तो आप बौद्धिक रूप से गुलाम रोबोट है जिसे केवल वही दिखता है जो उसको व्हाटसअप, फेसबुक के माध्यम से देश, धर्म की शह देकर जागने वाली खबरें प्रेरित करती है। अन्यथा आप यह स्वीकार कर चुके है कि सरकार किसी की हो, चुनौतियां कितनी भी हो, संघर्ष के आयाम कुछ भी हो किन्तु आप अपने आरामदायक जीवन को और सहज बनाने पर ही विचार करेंगे। आप उसे फालतू समझ अपना समय उन विषयों पर बर्बाद नहीं करेंगे। क्योंकि आपने उन सबका ठेका लाइसेंसी राज के तहत नेताओं को सौंप दिया है। लेकिन आपको याद रहे मानवीय या प्राकृतिक आपदा सामान्य चयन प्रक्रिया के तहत लोगो का चुनाव नहीं करती है बल्कि सबको अपने जद में शामिल करती है। आप याद करने की कोशिश करिये भौगोलिक बँटवारे की विभीषिका। 1947 का बंटवारा किसी के भी ज़िद या महत्वकांक्षा का नतीजा रहा हो लेकिन उस भौगोलिक आपदा ने लाखों लोगों के खून से स्वयं को रक्तरंजित किया था। एक क्षण में उन नागरिकों को अपना घर, जिला, राज्य आदि छोड़ कर चले जाने को कहा गया। खून से सनी लाशें एक-दूसरे मुल्क से आ रही थी। जिसका दुष्परिणाम आज भी ज्ञात होता है। आपको पता है कि ऐसा क्यों हुआ ? दरअसल ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस वक़्त आम जनता कुछ विशेष नेताओं को अपना पालनहारा और नुमाइंदा समझते थे। इसलिए उन्होंने तत्कालीन आंदोलन में शून्य सहभागिदारी दिखाया था। अब उस वक़्त की विडंबना देखिये कि जिन लोगों ने साथ लड़कर देश के आज़ादी के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया वही लड़ाई के आखरी पड़ाव पर आते-आते मजहबी कौम के आधार पर बँट कर एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। आज़ादी के औपचारिक रूप से दोनों मुल्क ने 70 झंडे भले ही फहरा दिए हो लेकिन दोनो ही मुल्क शासन तले प्रशस्त हुआ/हो रहा है। याद रखें शासन और लोकतंत्र एक दूसरे के घोर विपरीत है। मसलन शासन की बुनियादी सामग्री है राजनीति। और जब शासकीय महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए हर विषय, क्षेत्र में राजनीत के प्रेत का समावेशन होता है तो सबसे पहले लोकतांत्रिक मर्यादाएं ध्वस्त होती है। और किसी भी क्षेत्र में शिष्टाचार को बनाए रखने के लिए मर्यादा बहुत जरूरी है। लिहाज़ा दोनो मुल्क के आजादी के 70 वर्षों को पढ़ीये और पड़ताल कीजिये कि 1947 से पहले वाली लोकतांत्रिक परिकल्पना आज उस कल्पना के कितने हक़ीक़त को फर्श पर सजा पाई है। जिन्ना के सपनों का पाकिस्तान और गांधी,नेहरू के आधुनिक भारत की कल्पना कितना धरातल पर भौतिक रूप धारण कर पाई। आप इस बात का आसानी से अंदाज़ा लगा सकते है। इसलिए देश के राजनीत में गंभीरतापूर्वक अपनी वैचारिक व बौद्धिक उपस्थिति दर्ज़ कराएं। अन्यथा इतिहास में केवल एक आंकड़ा बनकर ही रह जाएंगे। जिनकी गणना केवल दंश को याद करने में की जाती है। बहरहाल, आज मैं यह सब दिल में एक व्यथित बोझ के साथ लिख रहा हूँ जो शायद आपलोगों तक पहुंच कर कुछ फीसद कम हो सके। क्योंकि मुझे पता चला है कि मायूसी बाँटने से घटती है।
