Monday, October 2, 2017

बापू को आभार पत्र...

प्रिय बापू (मोहनदास गांधी),
  सादर प्रणाम।
आपके बारे में जब पढ़ता हूँ, कुछ सुनता हूँ, आपको समझता हूँ तो ज़हन में एक ही सवाल उठता है कि 'बापू
आप न होते तो क्या होता'।। सबका तो नहीं पता, लेकिन बापू आप न होते तो शायद मैं एक मुखर आलोचक, लोकतांत्रिक व्यक्तित्व, यथार्थवादी साहसी बनने के लिए नैतिक साहस नहीं जुटा पाता। कुछ पढ़े-लिखे जाहिल डिग्रीधारीयों और ज़्यादतर कुंठाग्रस्त अनपढ़ों ने आपके खिलाफ न जाने कितनी झूठी और अश्लील भ्रामक तथ्यों को फैलाकर आपके व्यक्तित्व को दूषित करने का कोशिश किया। आपकी तस्वीरों को फ़ोटोशॉप के ज़रिये अश्लीलता के पराकाष्ठा पर पहुंचाने का पूर्ण सामर्थ्य लगाया गया। आप पर मुसलमान प्रेमी, हिन्दू विरोधी, नेहरू प्यार, जिन्ना सहारा होने का आरोप लगाया जाता है, जिसके ज़रिये आपके मान का मर्दन किया जाता है।  किंतु उन कुपमंडूको को यह नहीं पता कि आप गंगा की तरह पावन हैं जो समाज के कुछ जाहिलों के द्वारा मैला तो किया जाता है लेकिन उसकी महत्ता सदियों से अर्जित धरा को सदैव पावन करती है। आपके ऊपर कितना भी संगीन फ़र्जी आरोप मढ़ा जाता है लेकिन आपकी वैचारिक शीलता उसे नकार देती है। आप केवल मात्र एक व्यक्ति नहीं थे आप एक विचार हैं जो लाख प्रायोजित क्षति पहुंचाने के बावजूद भी आप सदियों तक जीवित रहेंगे। विडंबना तो यह लगता है बापू कि आपके जन्मदिवस के आधार पर संयुक्त राष्ट्रसंघ के द्वारा 2 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाया जाता है लेकिन जिस धरा पर आपने अपने प्राण न्योछावर किया वहाँ अहिंसा दिवस के स्थान पर स्वच्छ भारत का बिगुल फूंका जा रहा है। आपके व्यक्तित्व को समझकर ही एक तर्कवादी मनुष्य बनने के लिए प्रयत्नशील हुआ हूँ। और जो लोग आपके ऊपर छींटाकशी करते हैं, मैं उनको चुनौती देता हूँ कि वो सच्चे दिल से मात्र एक दिन-रात आपके जीवन को जियें और फिर वह अपने अनुभवों को साझा करें कि महात्मा गांधी का जीवन 24 घंटे के लिए जीना उनके लिये कितना आसान और कितना चुनौतीपूर्ण रहा। धरा के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिकों में शुमार अल्बर्ट आंइस्टीन ने भी यह कहा था कि आने वाली पीढियों को यह यकीन नहीं होगा कि हाड़-माँस का यह व्यक्ति कभी पृथ्वी पर चला होगा। बापू केवल यह देश ही नहीं आपके व्यक्तित्व और विचार का कायल नहीं है बल्कि सम्पूर्ण विश्व आपका मुरीद है। आपके व्यक्तित्व का अप्रतिम आभूषण इस देश के ऊपर जड़ा है किन्तु आपके व्यक्तित्व को अपरिभ्रंस तले कुचलने की साज़िश निरंतर होती रहती है। विश्व के कुल 86 देशों में आपकी मूर्ति लगी है। कुल 148 देशों में आपके नाम का डाकटिकट चलता है। नेल्सन मंडेला ने आपके व्यक्तित्व से प्रेरित होकर अफ्रीकी रंगभेद के संघर्ष को ख़त्म किया। दर्जनों नॉबेल विजेता आपको अपना आदर्श मानते हैं। आइंस्टीन, टैगोर से लेकर मार्टिन लूथर किंग तक आपके प्रशंसक थे। लेकिन यह दुर्भाग्य है हम भारतीयों का कि हमने नज़दीक से भी आपको उस गंभीरता के साथ नहीं जाना जितना विदेशियों ने आपको समझा और जाना।। लेकिन अंततः मैं यही सोचता हूँ कि बापू आप ना होते तो क्या होता। क्या मैं निर्भीकता के साथ वो बातें अभिव्यक्त कर पाता जो आज करने की साहस रखता हूँ।

आपका मुरीद
प्रेरित कुमार।।

Wednesday, September 27, 2017

बीएचयू प्रशासन द्वारा महिला छात्रों पर हमला के क्या मायने है..??

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों पर विशेष करके लड़कियों पर हस्तास्त्र हमला करना महज़ एक अराजकता को दबाने की प्रशासनिक कार्यवाही भर नहीं है बल्कि वह असल मायनों में फांसीवादी के निरंतर विस्तृत होते दायरों का उत्सव है। याद रखें फांसीवाद सर्वप्रथम लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त करता है और उसके उपरांत मानवीय अनुशीलन को आतुरतापूर्वक खा जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमतियों को डंडे के दम पर ख़त्म नहीं किया जाता है। बल्कि उस डंडे की चोट एक अराजक व निर्भीक कौम को जन्म देती है जिससे लोकतांत्रिक शुचिता कमज़ोर पड़ती है किंतु जनसंवेदना अथाह प्राप्त होता है। नवरात्र का दिन चल रहा है और सनातनी मंत्र का उच्चारण भी अक्सर किया जाता है 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता' अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता विराजते है। फिर अचानक इस माँ दुर्गा वाले नवरात्रि माह में महिलाओं पर संवेदनहीन हमला करना कितना उत्साहवर्धक है समाज के लिए। शर्म तो इस बात का है कि उन लड़कियों पर हमला PAC के पुरुष जवान ने महिला छात्रावास में घुस कर किया है। इसे एक संवैधानिक व लोकतांत्रिक देश में अराजकता का नंगा नाच कहा जा सकता है। महिला छात्रों के लिंगभेदी उन्मूलन का प्रतिवाद महिला छात्रों के प्रतिकूल बन गया। परंतु निश्चित रूप से यह प्रशासनिक हमला आंदोलन को और तठस्थ बना गयी। यह प्रदर्शन महिलाओं के अस्मिता व विश्वविद्यालय के समाजिक समानता को लेकर है मसलन इस पर वामपंथी, कांग्रेसी अथवा भाजपाई के छात्र राजनीति की दृष्टि से निर्णय लेने से बचें। विचार कर लें, इंसान के अस्तित्व व सम्मान से अधिक दल का अभिवंदन संभव नहीं है। यह प्रदर्शन एक महिला होने के बुनियादी सुविधाओं के नैतिक अधिकार का मांग है। यह महिला छात्र के आत्मसम्मान का नैसर्गिक मांग है। यह लिंगभेदी सभ्यता को नष्ट करने का शंखनाद है। महिला छात्रावास के खिड़कियों के सामने पुरुषों के द्वारा अश्लील नुमाईश की बेशर्म घटनाओं का भी विरोध प्रदर्शन है। छोटे कर्मी से लेकर बड़े अधिकारी व छात्र तक विश्वविद्यालय की छात्रा एवं उनके छात्रवास के समक्ष ऐसी हरकत करते है जिसे एक पिता अथवा एक परिवार के लिए नैतिक शर्म का सबब बन जाएगा कि हमने अपने घर में एक बच्ची को क्यों जन्म लेने दिया,जब हम उसे सामाजिक सम्मान नहीं दे सकते, जब हम उसके लिये एक सुरक्षित समाज नहीं दे सकते है। सरेआम लड़कियों के ऊपर लाठी,डंडा से हमला कराया गया। रबर के गोले दागे गए। और हद तो तब हो गया जब इस भयानक हमला के बाद सारी रात हॉस्टल की बिजली काट दी गयी। आप कल्पना करें। आज यह एक विश्वविद्यालय में किसी दूसरे की बहन-बेटियों के साथ घटा है लेकिन कल को इस बात की क्या गारंटी है कि यह घटना आपके परिवार के किसी बच्ची के साथ किसी संस्थान में नहीं घटेगी। किन्तु इस बात की गारंटी है कि यदि आज आप ऐसी व्यवस्था व ऐसे कलुषित मानसिकता वाले समाज का प्रतिकार अथवा बहिष्कार करते है तो शायद आने वाले वक्त में हमारी बहन-बेटियाँ महफ़ूज़ रह सकती है। अमन-चैन के साथ बेहिचक कहीं भी पढ़ने अथवा अन्य कार्य के लिए परिवार से दूर जा सकती है। मसलन इस चारित्रिक भ्रष्टतंत्र के खिलाफ़ आज आप सभी लोगों को आवाज़ उठानी पड़ेगी।।

Friday, August 11, 2017

पहलाज निहलानी को खुला ख़त....

पूज्यवर पहलाज निहलानी जी,
              सादर संस्कारी दण्डवत प्रणाम आपको।
भारत के तमाम संस्कृतियों व संस्कारों के विलुप्त होने की परंपरा में आज देश ने आपके जैसे एक बहुत बड़े संस्कारी व्यक्ति के विलुप्त होने का काला दिवस मना रहा है। दरअसल जब से मैंने सुना कि भारतीय संस्कार के प्रबल प्रवर्तक पहलाज निहलानी को केंद्रीय फ़िल्म प्रमाण बोर्ड से निकाल दिया गया तब से हृदय की धड़कन का कंपन्न तीव्र हो गया है। पूरे कमरे के भीतर मनहूसियत सा महसूस कर रहा हूँ। कमरे के भीतर टंगी मार्यादा पुरुषोत्तम राम की तस्वीर देख रहा हूँ। आप 21वीं सदी के दूसरे दशक में भारतीय संस्कृति एवं संस्कार को स्थापित करने वाले पहले महावीर थे। आपके भीतर नैतिकता का वो प्रशांत महासागर था जो किसी भी कीमत पर भारतीय संस्कार को क्षति नहीं पहुंचने देता था। आपने जेम्स बांड से लेकर कितनों तक को भारतीय संस्कार में रंगने के लिए बाध्य कर दिया था। आखिर में जाते-जाते मधुर भंडारकर के फ़िल्म से लेकर नवाज़ुद्दीन के फ़िल्म तक में 40 कट लगाकर संस्कारों से भर दिया। आपके इस संस्कार प्रेमी होने के चरित्र का मैं फैन हो गया था। कई घण्टों तक मैं पशोपेश में रहता था कि आप किस मंत्र का जाप करके फ़िल्म को संस्कारवान बनाने के जुगत में लग जाते थे। आपके इस संस्कृतिक संस्कार का राज़ सुंदरकांड  था या हनुमान चालीसा मैं यही सोचता रहता था। यह जानने के लिए मैंने आपके कई इंटरव्यू को देखा और पढ़ा किन्तु भीतर की उत्सुकता को शांत करने में असफल रहा। हालांकि शुरुआत में मुझे ऐसा लगता था कि आपने ही सभी प्रकार के भारतीय संस्कृतियों को बचाने का ज़िम्मा क्यों ले लिया है। क्या भारत की जनता इतना संसाधन विहीन है कि आपके संस्कारवान फ़िल्म दिखाने पर वो अश्लील और संस्कृति शत्रु फ़िल्म नहीं देखेंगे। आपके पास कई प्रकार के प्रमाण पत्र होता है लेकिन आप A(वयस्क) प्रमाण पत्र देने से पहले भी उस फ़िल्म को U(अप्रतिबंधित सार्वजनिक प्रदर्शनी) बना कर ही A प्रमाण पत्र देते थे। मैं भीतर से क्रोधित भी होता था कि आप वयस्क फ़िल्म को A सर्टिफिकेट दे तथा अन्य श्रेणी के फ़िल्म को उसी आधार पर सर्टिफिकेट दें। यह भारत की जनता स्वतः तय कर लेगी कि उसे क्या देखना है और क्या नहीं। यह विडंबना भी लगता था कि जिस देश के भीतर लाखों अश्लील फिल्मों(पोर्न साइट्स) का मंच उपलब्ध है वहाँ आपका जबरन कान पकड़कर संस्कारी बनाना कितना सार्थक है। लेकिन मैंने अन्ततः तय कर लिया कि किसी भी प्रकार का कुंठा स्वयं के भीतर पालन स्वयं के स्वास्थ्य को क्षति पहुंचाने के अलावा और कुछ नहीं है। क्योंकि इसका परिणाम मैंने FTII के प्रतिरोध में देखा था। इसलिए मैं देश के असल संस्कृति जो विरासत में मिला था "बेचारा" बने रहने वाला लिबास। उसी बेचारा वाला नाव के सहारे आपके जबरन कॉलर पकड़ कर संस्कारी बनाने वाले मुहिम में शामिल होकर वैतरणी पार कर लिया। लेकिन दिल में एक कड़वी कसक रहती थी कि काश आप हर उस अश्लीलता को खत्म कर देते जिसे लोग पूर्वर्ती कालों में प्राकृतिक कर्म के नाम पर कामदेव के साहित्य की अर्चना करते थे। लेकिन जब मैंने आपके निर्देशित फिल्मों में से आँखें, शोला और शबनम आदि  को देखा तो मुझे लगा कि उस दौर में आपका संस्कार मर्यादित नहीं था अथवा तब संस्कारी प्रवृत्ति वाले चेयरमैन की प्रजाति ही विलुप्त होगी। लेकिन आपके इस हश्र का अंदाज़ा मैंने उस वक़्त लगा लिया था जब देश के भीतर देखा कि यह 'संस्कृति सुरक्षा योजना' तो वैलिडिटी पीरियड वाला है। उसी वक़्त सोचा था कि आपके संस्कारी कुर्सी का भी वैधता केवल संस्कारी होने के आखरी खुराक तक ही है। खैर, यह मेरी अभिलाषा है कि आप आजीवन संस्कारी बन कर संस्कार का मंद शीतल बयार फैलाते रहें। लेकिन अंत मे आपसे एक गुज़ारिश भी है कि कृपया करके आप पद मुक्ति के बाद अपने आँखे फ़िल्म के डाइरेक्टर वाले संस्कार में न प्रवेश कर जाइएगा, अन्यथा देश सदियों तक किसी संस्कारी पर विश्वास नहीं करेगा।
                            धन्यवाद।।
       आपका एक प्रशंसक
        प्रेरित कुमार। 🙏

Thursday, August 3, 2017

गरीबी का दुश्मन है शिक्षा का व्यवसायीकरण।

हमारी भारतीय सनातनी परंपरा जिसके आयु की गणना असंभव है। जो ज्ञान और अध्यात्म के ज़रिये मोक्ष दिलाने की दक्षता रखता है। जहाँ एक यशस्वी राजा सिद्धार्थ अध्यात्म के रास्ते ज्ञान की धरती बौद्ध-गया पर निर्वाण की दीक्षा प्राप्त करता है, बिना किसी मौद्रिक कीमत के। जहाँ एक चाणक्य नामक शिक्षाविद सम्पूर्ण राष्ट्र में निशुल्क प्रकांड ज्ञान का रोशनी फैलाता था। किन्तु आज वही भारतीय सनातनी परंपरा के भीतर शिक्षा और दीक्षा को व्यवसायीकरण जैसे कोढ़ ने अपने भीतर समाहित कर लिया। आज शिक्षा के तमाम सैधांतिक मर्यादाएं व्यावसायिकता के तोप से ध्वस्त की जा चुकी है। शिक्षा आज के मौजूदा वक्त में धनाढ़ों और धन्नासेठों की निजी संपत्ति तक सीमित हो चुका है। शायद आज के इस दौर में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आज यदि बुद्ध, महावीर,आर्यभट,आदि-शंकराचार्य,विवेकानंद,ज्योतिबा फुले आदि जैसे कालजयी दिव्य महापुरुष होते तो इनके लिए शिक्षा एक अप्रासंगिक विषय होता। क्योंकि ये दिव्य महानुभाव आर्थिक रूप से असक्षम परिवेश से संबंध रखते थे,किन्तु तब कि शैक्षणिक व्यवस्था निजता व असामाजिकता के दायरे में नहीं थी, लिहाज़ा इन्होंने शैक्षणिक अवसर का सम्मान किया और आज ये प्रबल प्रवर्तक के रूप में पूजे जाते है। लेकिन आज शिक्षा का हालात व्यवहारिकता एवं व्यावसायिकता के ढर्रे पर भिन्न हो चुका है । यह विडंबना ही है कि आज उन महापुरुषों के मुफ्त दीक्षा का इतिहास बिना उच्चतर आर्थिक लगान के नहीं पढ़ाया जाता है। मौजूदा दौर में यदि उन दिव्य पुरुषों के ज्ञान उद्द्भव पर यदि अनुसंधान करने के लिये काफी अधिक रकम उस शैक्षणिक संस्थान को चुकाई जाती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल जो हर ज़हन में उठता है कि आखिर गरीबी और मुफलिसी के लिबास में जी रहे भारत के भविष्य बुनियादी शिक्षा से भी वंचित क्यों है। उनके साक्षरता दर का अल्प आकड़ा भी उन्हें मामूली शैक्षणिक प्रतिभा से दूर क्यों खड़ा कर रखा है। हालाँकि इसका शत-प्रतिशत आरोप पूर्व से लेकर वर्तमान सरकार पर लगाना उचित नहीं होगा, कुछ सहभागिता हमारे असजगता को लेकर भी है। किन्तु ऐसी गरीब विरोधी शिक्षा व्यवस्था व्यापक रूप से तमाम सरकारों के नाकामी का स्मारक है। क्योंकि यह सूर्य के अँधियारी विरोधी रौशनी सरीखे एक हकीकत है कि हर सरकार गरीबी के उत्थान और गरीबों को शिक्षित करने के नाम पर सत्ता में आती है, लेकिन वो सत्ता के मद में प्रवेश करते ही गरीबों के शिक्षा विरोधी हो जाती है। इसका अव्वल प्रमाण तो यह हो सकता है यदि आज शिक्षा का निजीकरण होकर व्यवसायिकता में बदल चूका है तो ऐसी अनैतिक शिक्षा व्यवस्था उन सरकारों के छाँव तले ही पाँव पसार चुकी/रही है। लिहाज़ा देश के गरीब नागरिकों, जो देश के भीतर महज़ आकड़ा के रूप में ही ज्ञात किये जाते है उन्हें सचेत हो जाना चाहिए। यदि सरकार गरीब नागरिकों के शिक्षा के लिए अपने सरकार का महिमामंडन करती है तो उन समस्त नागरिकों को उनके महिमामंडनीय भाषण के भीतर सिर्फ अपने उपेक्षा की हकीकत को गौर करना चाहिए। क्योंकि वो बड़ी चालाकी से गरीबों के सामने गरीबी का मखौल उड़ाते है। जबकि गरीबों को इस बात का जरा सा भी इल्म नहीं होता है। मसलन आज शिक्षा की सीढ़ी आर्थिक बुनियाद पर जा टिकी है। यदि आप आर्थिक रूप से प्रबल है तो शिक्षा की तमाम उपाधियाँ एवं संसाधन आपके समक्ष नृत्यांगना के रूप में इर्द-गिर्द भटकती रहेगी। परन्तु यदि आप आर्थिक रूप से उपेक्षित है तो शिक्षा आपके जीवन की धुर-विरोधी बन कर रहेगी। लेकिन सरकारी नुमाइंदों के ज़रिये अपनी उपलब्धि गिनाने के लिए यह तर्क पेश किया जा सकता है कि सरकारी शिक्षा बजट अधिक है निजी शिक्षा संस्थानों के मुकाबले। किन्तु ऐसे में यदि आप सवाल करें कि यह सत्य है तो कम शिक्षा बजट होते हुए भी निजी शैक्षणिक व्यवस्थाओं की गुणवत्ता ज़्यादा शिक्षा बजट वाली सरकारी शिक्षा व्यवस्था के मुकाबले अधिक गुणवत्तापूर्ण क्यों है। तब ये अव्यवहारिक नुमाइंदें अपनी लापरवाही को नहीं दर्शाएँगे बल्कि उसी में उलझा कर रख देंगे। बहरहाल, आज देश के भीतर शिक्षा व्यवस्था भ्रष्टाचार का एक विशाल केंद्र बन चूका है। जिसका भुगतान भारत के गरीब सामान्य नागरिक कर रहें हैं,अपनी शैक्षणिक वंचित आकड़े को ठोस बना कर। मसलन आज देश के मुंहाने पर शिक्षा का निजीकरण जैसे गंभीर समस्या के रूप में खड़ा है। मेरा यह निजी विचार है कि यदि सरकार व प्रशासन एकरसता के साथ इस निजी शिक्षाकरण व्यवस्था के व्यवसायिकता को कठोर क़ानूनी रूप से निषेध कर देती है तो देश की अधिकतर समस्याएँ खत्म हो सकती है। इससे आर्थिक असमानता, जातिय गैर-बराबरी, छात्रों की सृजनशीलता व रचनात्मकता का निर्माण, आदि विषयों पर सफलता प्राप्त किया जा सकता है।

Monday, July 3, 2017

भीड़ के हाथों दम तोड़ता भारतीय लोकतंत्र !

मुल्क में चारो तरफ एक हिंसक हत्यारी भीड़ का शोर बह रहा है। उस शोर का सैलाब लगातार आपके कल्पनाशीलता को खत्म कर रहा है। आपके भीतर के रचनात्मकता को पिट-पिट कर मार रहा है। वो हत्यारी भीड़ संवैधानिक व्यवस्था के समानांतर खड़ी होकर लोकतंत्र को कुचल रही है। लेकिन आपको सनद रहे कि भीड़ न तो किसी मजहब की होती है और न किसी जाति की। लेकिन फिर भी ये हत्यारी भीड़ हमेशा किसी धर्म या मज़हब का होने का दावा करती है। ये भीड़ हमेशा संस्कृति, मजहब, राष्ट्र आदि बचाने के नाम पर हमला करती है। दरअसल ये हत्यारी भीड़ ऐसा इसलिए करती है ताकि उस समाज के लोग उसके समर्थन में खड़े हो सकें। लेकिन वास्तविक रुप से ये भीड़ एक वैचारिक ज़हर के खेत में उगा वह मानसिक हिंसा का फसल है,जिसका एक ही उद्देश्य होता है अपने वैचारिक दल को सत्ता तक फायदा पहुंचाना और लोगों को अन्य बुनियादी मुद्दों से भटका कर अपने आका के प्रति सच्ची निष्ठा दिखाना। यह भीड़ न तो कहीं बाहर से आती है और न ही वो मरने वाला भीड़ का शिकार। लेकिन दुर्भाग्य से इस साज़िश को न तो हमारे मुल्क़ के नागरिक समझ पा रहे हैं और न ही ये हिंसक दल किसी को समझने देना चाहती है। इन साजिशों की विडंबना देखिये कि एक तरफ वो हत्यारी हिंसक भीड़ भी हमारे बीच से ही इकट्ठा कर रहे हैं और उसका शिकार भी हमारे बीच से ही चुन रहे हैं। दूसरी ओर वो नैतिकता का तक़ाज़ा दिखाकर हम सब के बीच लोकतंत्र का भ्रम भी बनाए रखते हैं। मसलन भीड़ अपना शिकार कभी आलोचना या समीक्षा का विरोधाभास खड़ा करने वाले को चुनती है अथवा किसी को केवल संशय के आधार पर शिकार बनाती है। इन दोनों अवस्था में हमारे आसपास की टहलती भीड़ उस व्यक्ति को मार देती है। ये भीड़ रविंद्र को भी मारती है, यही भीड़ पहलू खान, जुनैद, अख़लाक़ को भी मारती है। यही भीड़ झारखंड के शोभापुर गांव में बच्चा चोरी के नाम पर नईम,हलीम और सज्ज़ाद को भी मारती है। यही हत्यारी भीड़ झारखंड में एक 80 वर्ष की बूढ़ी दादी के सामने उसके पोता उत्तम, गौतम और विकास को भी मारती है। वो हत्यारी भीड़ पश्चिम बंगाल के इस्लामपुर में पशु चोर के नाम पर समीरुद्दीन, नसीरुल, और नारिस को भी घेर कर मारती है। यही भीड़ तमिलनाडु के करुपैया और एन अरविंद को भी धायल करती है। यही हत्यारी भीड़ कश्मीर में डीएसपी अय्यूब पंडित को भी मारती है और यही भीड़ आर्मी अधिकारी उमर फैयाज़ को भी मारती है। यही भीड़ आगरा में अरुण माहौर को भी दिनदहाड़े गोली से मारती है और यही भीड़ दिल्ली में डॉ पंकज नारंग को घर से खींच कर मारती है। इन सभी घटनाओं में से भीड़ ने न तो किसी को धर्म के नाम पर बख़्शा है और न ही मज़हब के नाम पर। इसलिए हम भारतीयों को इसे धर्म,मज़हब का नुमाइंदा न बनाकर एक हिंसक दरिंदा के रूप में चिन्हित करना चाहिए। अन्यथा वो हत्यारे उन धर्म व मज़हब के पवित्र छांव में खुद को छिपा कर बच जाएगा। खैर, एक बात जो सोचने वाली है कि आखिर यह भीड़ किन लोगों के इकाइयों से इकट्ठा होकर बनती है। भीड़ के हत्यारा सदस्य बनने की पात्रता क्या है। इस भीड़ वाले समूह को कौन उकसाता है। यह भीड़ किसके इशारों पर हमला करती है। क्या हमारे साथ पढ़ने वाला, काम करने वाला, मोहल्ले का पड़ोसी आदि भी कोई उस भीड़ में शामिल रहता है। यदि उस भीड़ में शामिल हमारे देश के नागरिक ही होते हैं तो सबसे भयावह सवाल है कि क्या हम ऐसे हत्यारों के बीच में खुद को कभी महफ़ूज़ पाएंगे। अब नैतिक रूप से आप स्वयं आत्मनिरीक्षण करते हुए याद करने की कोशिश करिये कि आपने इस हत्यारी भीड़ को बनाने, उकसाने में कितना सहयोग किया है। आपने मैसेज़ के ज़रिए कितने लोगों के भीतर हत्या का फसल बोया है। आपने व्हाटसअप और फेसबुक पर ऐसे कितने मैसेजों को शेयर किया है, जो आपको जाती, मज़हब, राजनीतिक विरोधी, बच्चा चोरी, आदि का वास्ता देकर बाध्य करती है आगे फॉरवर्ड करने के लिए। आपने कब-कब उन उन्माद वाली अफवाहों को फैलाया है जो आपके संस्कृति को बचाने का दावा करती है और उसके विरोधी को मारने के लिए मजबूर करती है। दरअसल हम और आप जानबूझकर या अनजाने में ही सही लेकिन इस भीड़ को हमारे इन्हीं करामातों ने जन्म दिया है। फिर भी अगर आप इस भीड़ और हत्या को देखर विचलित नहीं हो रहे है तो यकीन कीजिये कि यह आपके लिए भयावह भविष्य का आगाज़ हो रहा हैं।आप उस हत्यारी भीड़ के हत्या को देखकर केवल अपने आप को साक्षी मान रहे हैं तो दरअसल आप गफ़लत में जी रहे हैं। क्योंकि आप भी उसी शिकार के कतार में खड़े हैं। तय मानिये आप या आपका परिवार भी उसी रेलगाड़ी से सफ़र करेगा। वो भी दिन या रात में उसी शहर, उसी बाज़ार और उन्हीं भीड़ के बीच से गुजरेगा। हालांकि ऐसा न हो लेकिन यदि उस भीड़ को आप या आपके परिवार में से किसी पर शक हो गया तो उसका अंजाम कितना डरावना हो सकता है। इसलिए अगर आपने वक़्त रहते उन हत्यारी भीड़ के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद नहीं की तो वो भीड़ एक दिन आपके परिवार और बच्चों को भी उसी सफर में अपना शिकार बनाएगी। और अंत में एक दिन आप भी उस भीड़ के शिकार बनेंगे। इस हत्यारी भीड़ से बचने का कोई भी प्राकृतिक रास्ता नहीं है। न तो आप धर्म,जाती और गोत्र के आधार पर बच सकते हैं और न ही आप वैचारिक सहयोग के आधार पर। ये भीड़ किसी को भी नहीं बख्शेगी। जिस तरह शरीर को भोजन न मिलने पर शरीर धीरे-धीरे स्वंय को खाते हुए मनुष्य को कमज़ोर करके नष्ट करता है ठीक उसी प्रकार जब उस भीड़ को कोई शिकार नहीं मिलेगा तो अपने आसपास के लोगों को ही मारेगी और एक वक्त ऐसा भी आएगा कि वो अपने भीड़ से निकाल कर एक-एक करके सब को खत्म कर देगी। आप सोचिये कि वह कल्पना कितनी भयावह होगी जब वो हत्यारी भीड़ आपके अपने,सगे-सम्बंधी को अपना शिकार बनाएगी। मसलन अभी भी अधिक वक़्त नहीं गुज़रा है। आप आज से ही यह प्रण ले कि आप किसी भी अफ़वाह को शेयर फॉरवर्ड नहीं करेंगे और लोगों को ऐसा करने से रोकेंगे। यदि कोई आपको मैसेज या निजी रूप से मिलकर आपको आपके संस्कृति, देश, धर्म, मज़हब, जिहाद आदि के ऊपर ख़तरा बताकर आपको जागने के लिए कहे तो ऐसे लोगों को पहले मानसिक तौर पर जागरूक करने की कोशिश कीजिये और उन्हें वास्तविक बुनियादी बातों से रूबरू कराइये। लेकिन फिर भी यदि उस बौद्धिक ज़हर से मुक्त नहीं होना चाहते हैं तो उनसे तुरंत सभी प्रकार के सम्बंध को समाप्त कर स्वयं और समाज पर उपकार लें।

अभी सुप्रीम कोर्ट ने भी मॉब लिंचिंग को लेकर अपना कड़ा रुख अख्तियार करते हुए केंद्र सरकार से कानून बनाने की मांग की है। मतलब इस खतरे की चुनौती अब सर्वोच्च न्यायालय के दीवार के भीतर पहुँच चुकी है। इसे लोकतंत्र के जड़ में मट्ठा समझा जाने लगा है।

नये पिढ़ी के पत्रकारों की अकांक्षा और संर्घष की वास्तविकता।

भारतीय मीडिया यदि आज विश्वसनीयता के संकट से गुजर रहा है तो उसकी एक बड़ी वजह मीडिया का उद्योगीकरण हो जाना भी है। एक पत्रकार तमाम प्रकार के मानसिक दबाब से गुजरता है किसी भी सतही राजनीतिक गंभीर खबरों के प्रस्तुतिकरण को लेकर। कॉर्पोरेट घरानों और नेताओं के एकरसता के बीच में ही मीडिया का दम घूंट रहा है जिस वजह से विश्वसनीयता दम तोड़ रही है। आज मीडिया कई फाड़ में बँट चुका है । एक आम भारतीय से यदि यह सवाल पूछा जाता है कि आप किस चैनल या अखबार को समाज का सबसे गंभीर चिंतक मानते है,तो उनका उत्तर स्पष्ट होता है कि ऐसी कोई भी संस्था नहीं है।दरअसल यह विचार करने योग्य है कि चैनल या अखबार सामान्य धार्मिक व मज़हबी खबरों को नहीं उठाता है बल्कि उन धार्मिक-मज़हबी ख़बरों को उठाता है जिसके बुते वह अपने सांस्थानिक आका एवं राजनैतिक आका को खुश रख सके। अगर कोई उनके ख़िलाफ़ निष्पक्ष ख़बर प्रस्तुत भी करता है किंतु संस्था के राजनैतिक आका के ख़िलाफ़ है तो यह मान के चलिए उस पत्रकार को पहले अपशिष्ट मानसिक यातना देकर आगे से ख्याल रखने का फरमान दिया जाता है अन्यथा बोरिया-बिस्तर के साथ पलायन करने का मशवरा भेंट किया जाता है । निजी रूप से मुझे ऐसा लगता था कि शायद हमारी यह नई नस्ल जो वर्तमान में गर्म खून वाला आधुनिकता से लबरेज़ युवा नवजात पत्रकार है वह कुछ कर सकता है परंतु उन्हें सही स्थान और मार्गदर्शन नहीं प्राप्त होने के कारण उनके भी हौसले पस्त पड़ते जा रहे है। उन्हें संस्था कि इतनी तकनीकी नियामक व कार्य-मार्ग से गुजारा जाता है कि वह पत्रकारिता में कुशल होते हुए भी वह पत्रकार बनने से चूक जाते है। उन्हें हमारी मीडिया एक पत्रकार के जगह तकनीकी रोबोट बना के छोड़ देती है। जो सिर्फ खबरों के प्रस्तुतिकरण में अपनी तकनीकी भूमिका निभाते है, न कि सामाजिक व सैद्धान्तिक।कई ऐसे साथी से मिला हूँ जो एक गंभीर लेखक,चिंतक,एवं कुशल वक्ता होते हुए भी वह सुबह से शाम तक हैडलाइन,टॉप बैंड,ग्राफिक्स,टिकर लिखने में ही लगा रहता है तो कोई काबिल पत्रकार होते भी बाइट कटबाने और सी.जी चलाने में लगा रहता है। यदि कोई रचनात्मक तर्कसंगत विचार भी उनके भीतर किसी ख़बर को लेकर आता है जो समाज को एक नई दृष्टिकोण दे सकता है तो फिर भी वह उस रचनात्मकता का उपयोग नहीं कर पाते है। क्योंकि यह उनके आधिकारिक कार्य क्षेत्र का नहीं है। ऐसे लोगों से मुझे यह जानने की जिज्ञासा रहती है कि आखिर आप इतने काबिल होते हुए भी की-बोर्ड पर उँगली क्यों पटक रहे है। तो उनका जबाब एकदम सधा सा आता है कि कोई अन्य विकल्प ही नहीं है।आप ही कोई जुगाड़ लगा दीजिये। बात भी सही है, अब यह बेचारा गर्म खून वाला नवजात पत्रकार करे भी तो क्या करे जीविका उपार्जन के लिए काम भी जरूरी है।मीडिया का छात्र है तो सामाजिक रुतबा के लिए मीडिया में नौकरी भी जरूरी है। लिहाज़ा उसे एक मीडिया संस्थान के अंदर किसी भी निम्न पद पर प्रयोग किया जाता है और वह नवजात भी चाहता है कि कोई भी काम हो बस नौकरी लग जानी चाहिए। सुबह से शाम तक ऐसे कई कनिष्ठ पत्रकारों से मिलता हूँ जिनके चेहरे पर यह संघर्ष का भय आसानी से महसूस किया जा सकता है। वह मुझसे कहते है कि प्रेरित सर हमारे चुनौतियों और संघर्ष पर भी कुछ लिखिए। मसलन आज लिख रहा हूँ ताकि आप पाठक पढ़ कर यह विचार करें कि मीडिया आंतरिक रूप से ही अव्यवस्थित है तो फिर सामाजिक व्यवस्था का मुलम्मा समाज पर कैसे नैतिक खबरों से चढ़ा सकता है। बीते कुछ दिनों से मेरे एक वरिष्ठ भूतपूर्व सहकर्मी  प्रतिदिन अपने पोस्ट के माध्यम से पूछ रहे है कि "क्या एक कीबोर्ड पर उँगली पटकने वाला,या क्या एक मीडियाकर्मी को पत्रकार कहना चाहिए" ? ।..तो आदरणीय उन कर्मियों में से ज्यादतर पत्रकार बनने के ख्वाब से ही इस पढ़ाई को करते है किंतु किसी को मौका मिलता है तो किसी को नहीं।सिर्फ रिपोर्टर या एंकर बनना ही एकमात्र पत्रकार होने का मानक या उद्देश्य नहीं है। बल्कि उनकी सामाजिक सजगता,गंभीर चिंतन व स्वतंत्रता के समावेशन से एक आम नागरिक को पत्रकार बनाता है। जो अपना संवैधानिक दृष्टि से न्यायसंगत व निष्पक्ष विचार लिखित या मौखिक रूप से सामाजिक परिवेश में फैलाता है। आप कभी कीबोर्ड पर किसी उंगली पटकने वाले से(खास करके युवा से) पूछियेगा कि आप इस क्षेत्र में किन आकांक्षाओं के साथ आए थे और आप उन आकांक्षाओं के कितना करीब खुद को पाते है। तब उनका उत्तर हृदयविदारक रूप में ज्ञात होता है। दरअसल इन्हीं वजहों से मैं भारतीय पत्रकारिता दिवस को नहीं मनाता। क्योंकि भारतीय पत्रकार के जो पुरोधा थे गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रभाष जोशी आदि सरीखे कालजयी दिव्य पत्रकार।आज उनके सारे सिद्धांत और विचार हाशिये पर पेट के बल दम तोड़ रहा है।

बुद्ध, महावीर और गाँधी के देश में हिटलर आदर्श नहीं हो सकता...

हमारे भारतीय परिवेश में आम रुप से हिटलर के समर्थक पहले भी पाए जाते थे किन्तु बहुसंख्यक बल की संख्या में आज ज्यादा पाए जा रहे है। ऐसे लोग न तो लोकतंत्र में भरोसा रखते हैं और न ही मानवीय स्पंदन में। यह सिर्फ व्यक्ति विशेष तक ही सीमित न रह कर आजकल राजनैतिक दल भी एक दूसरे नेता के लिए हिटलर की संज्ञा का जमकर प्रयोग कर रहे है। जो हिटलर जर्मनी के लिए अभिशाप है वह भारत में अधिक लोगों के लिए प्रासंगिक है। मैं तो निजी रूप से आप पाठकों से आग्रह करूँगा कि यदि आपके आसपास का कोई भी व्यक्ति हिटलर बनने या हिटलर को नायक के रूप में पूजने का दावा करे तो उसे तात्कालिक प्रभाव से खुद से दूर कर दीजियेगा।क्योंकि ऐसे ही लोग पहले समाज के लिए फिर देश के लिए एक जटिल समस्या के रूप में उभरते है। यह भी एक विडंबना है कि बुद्ध,महावीर,गाँधी,आदि जैसे प्रेरणादायी नेता के धरती पर हिटलर जैसे क्रूर दरिंदा के वैचारिक जगत को विशेष स्वीकार्यता प्राप्त है। दरअसल हमारे देश में एक अवधारणा निर्मीत की गई है कि तानाशाही से देश सही हो जाता है। इसलिए लोग हिटलर को एक नायक के रुप में पसंद करते है। किंतु दुर्भाग्यवश ऐसे लोग हिटलर को ऐतिहासीक रुप से कम अध्यन करते है और काल्पनिक अवधारणा के रुप अपने भीतर ज्यादा जीवित रखते है। ऐसे लोगो को यह समझना चाहिए कि हिटलर एक प्रतिक या रुपक के तौर पर केवल तानाशाही को ही सूचित नहीं करता बल्कि वो एक खास तरह के फांसीवाद और तानाशाही को सूचित करता है। नाजी जर्मनी पर एक पुस्तक छपी है जो हिटलरशाही के प्रभावों को व्यंजक ढ़ंग से पेश करता है। बिते कुछ दिनों से उसे पढ़कर खत्म करने पर आमादा था ताकि आपलोगों के साथ कुछेक प्रमुख युक्ति साझा किया जा सके। पुस्तक का नाम है Hitler's Willing Executioners: Ordinary Germans and the Holocaust इसके लेखक है Daniel Goldhagen . वह लिखते है कि " असल में फासिज्म की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि जो अत्याचार हो रहे थे,जो लोकतांत्रिक संस्थाओं का पतन हो रहा था, जो यहूदीयों को निशानदेही के साथ हिंसक प्रवृति अपनायी जा रही थी।एेसा नहीं था कि जर्मनी के आम लोग उससे अवगत नहीं थे या उसके विरोध में थे"। 
अर्थात विरोध हो रहा था लेकिन बिलकुल न के बराबर। लोग इसे सामान्य और स्वभाविक मान के चल रहे थे। मसलन एक जातिय हिंसा (ethnic violence)और लोकतांत्रिक संविधान (Democratic constitution) के पतन को जब लोग सामान्य रुप से स्वीकार करने लगते है तो उससे फासिज्म के स्वीकार की भूमिका बनती है। जो भविष्य में उस मुल्क के इतिहास की गणणा अभिशाप के रुप में की जाती है। लिहाजा नागरीकों को यह सनद रहे कि फासिस्ट तानाशाही और दुसरी तानाशाही में फर्क होता है। फासिज्म में हमेशा स्वतत आंतरिक शत्रु (Internal enemy) की कल्पना की जाती है। आपको महसुस कराते है कि आपके देश के भीतर एक ऐसी संस्कृति और समाज के विशेष लोग है जिससे ये सारी समस्या की उत्पत्ति हो रही है। जैसे जर्मनी में यहूदियों को बनाया गया। हालांकि भारत में किसी को हिटलर या फ़ासिस्ट कहना बिल्कुल गलत बात है।आज भारत की संस्कृतियां विविध भले ही है किंतु लोकतांत्रिक चेतना इतनी जगी है कि यह संभव नहीं है। इसलिए बात को इतनी अतिशयोक्ति नहीं करनी चाहिए कि वह गलत युक्ति में तब्दील हो जाए। इन तमाम मसलों के बाद भी हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना है कि हमने तीन खाँचे तय किये है। लेफ्ट, राइट, और सेंटर। हम हर राजनैतिक दल को जबरन इन्हीं तीनों में से किसी मे घुसेड़ने की कोशिश करते है। हम हर नागरिक के विचार,प्रश्न, सिद्धान्त आदि को इन्हीं के खाँचों में जबरन डालते है। जो परिणामस्वरूप हमेशा परेशानी पैदा करती है और हमारा बुनियादी विमर्श केंद्र बिंदु से भटक जाता है। बहरहाल आपलोग भी हिटलर को विशेष रूप से पढिये और अपने आसपास नवजात हिटलर को फ़ासिस्ट हिटलर बनने से रोकिये। क्योंकि हिटलर भी एक अयोग्य सैन्यकर्मी था और देश के भीतर व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी वाला हिंसक भीड़ भी एक अयोग्य बेरोजगार है। सांस्कृतिक विविधता हिटलर को भी स्वीकार्य नहीं था और सांस्कृतिक विविधता इन हिंसक भीड़ वाले लफंगों को भी नहीं स्वीकार्य है।ऐसी अनेकों समानता नरकीय हिटलर और अशिक्षित बेरोजगार हिंसक भीड़ के बीच पाई जाती है। इसलिए संभल के रहिये और अपने अर्जित ज्ञान को लोगों से साझा करके उन्हें भी हिटलर बनने से रोकिये।