Sunday, April 22, 2018

भारत में लेनिन का वैचारिक इतिहास बनाम मूर्ति विध्वंस का वर्तमान !

देश में विगत महीनों में गाँधी, अम्बेडकर, लेनिन, पेरियार,श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि की प्रतिमा तोड़ी अथवा क्षतिग्रस्त की गई। प्रतिमा किसी व्यक्ति के जीवित ना होने पर उसके स्मरण के प्रतीक के रूप में स्थापित की जाती है। इतिहास में किसी व्यक्ति का कालखंड प्रासंगिक रहा है या भयावह किन्तु उसकी प्रतिमा का संरक्षण पारंपरिक जिम्मेदारी है। उसके ज़रिये हम नई नस्लों और पीढ़ियों को उस व्यक्ति के जीवनकाल से रूबरू कराते हैं। उन नस्लों को बताते है कि इनकी जीवनी ने हमारे समाज को प्रभावित किया या दुष्प्रचार किया। उससे नई नस्लें सीख लेती है और समाज,राष्ट्र के उत्थान को लेकर प्रचलित नीतियों का पूर्णावलोकन करती है। लेकिन वैचारिक कुंठा से ग्रस्त अराजकों ने इस अवधारणा को न तो समझने की ज़हमत उठाई और ना ही उसे फलने-फूलने दिया। नतीज़ा यह हुआ कि हम एक सुशोभित लोकतंत्र से कब वैचारिक अराजकतंत्र में तब्दील हो गए नागरिकों को पड़ताल ही नहीं हो पाया। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर विचारकों के विचारों को नष्ट कर सकते हैं। क्या उसके ज़रिए नीतिगत अवधारणाओं का प्रतिपादन वैकल्पिक कर सकते हैं। मूर्तियों को तोड़ कर कितनी विचारधारात्मक नीतियों को निम्न करने में सफलता प्राप्त हुई। ज़र्मनी का सबसे क्रूर शासक एडोल्फ़ हिटलर हुआ जिसने 1939 में अपने 'फाइनल सॉल्यूशन' नीति के ज़रिए यहूदियों को जड़ से मिटाना शुरू किया। 6 वर्ष के भीतर तक़रीबन 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी गयी। गैस चैम्बर में यहूदियों को डाल कर यातनाएं दी गयी। भारत में मूर्ति तोडकों को यह जानकर हैरत होना चाहिए और शिक्षा भी लेनी चाहिए कि आज भी जर्मनी उस भयावह खंडरों के इमारत को पर्यटन स्थल के तौर पर रखा गया है। ताकि उनकी नस्लें इस बात को महसूस कर सके कि उनके पूर्वजों ने किन यातनाओं और विध्वंसकारी आपदाओं का सामना किया है।

दरअसल सवाल यह है कि वैचारिक कुंठा ने निश्चित तौर पर बौद्धिक गुलामों को जकड़ रखा है और विचारधारा का विरोध प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दर्ज़ भी कर रहे हैं। लेकिन क्या उन्होंने इतिहास के संदर्भों को कभी पढ़ने या जानने की कोशिश की है। छद्म राष्ट्रवाद अथवा छद्म उदारवाद के छत्र तले वैचारिक महामारी तो फैलाने में इन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि ये लड़ाई भारतीय विचारक और विदेशी विचारक नहीं है। ये लड़ाई वैचारिक असहमतियों की है। फिर भी पेरियार,गाँधी, मुखर्जी, नेहरू, अम्बेडकर आदि तो भारतीय थे लेकिन जितना अधिक कुंठा लेनिन की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त करने के दौरान फैलाया गया है, क्या इनलोगों ने कभी लेनिन और तत्कालीन स्वाधीनता आंदोलन के महावीरों के बीच के रिश्तों का अवलोकन किया है।

एक खास वर्गों के द्वारा लेनिन को भारत का दुश्मन कहा जाता है जबकि जबकि भारत के पीड़ा को यदि सबसे पहले किसी अंतर्राष्ट्रीय नेता ने समझा तो वो ब्लादिमीर लेनिन ही थे। जिन्होंने 1908 में लिखा (https://www.marxists.org/history/etol/newspape/ni/vol08/no08/lenindia.htm)  था कि यदि रूस के बाद कहीं सबसे ज्यादा भुखमरी और गरीबी है तो वह भारत है। उस दौरान भारतीय नागरिक अपनी स्वाधीनता की लड़ाई लोकमान्य तिलक बाल गंगाधर के नेतृत्व में लड़ रहे थे। अंग्रेजी हुक़ूमत ने उस आंदोलन के दमन के लिए हर क्षुद्रता अपना चुकी थी। उस दौरान लेनिन ने अपने लेख में तिलक के ऊपर हुए हमलों की निंदा की थी। लेनिन ने अपने लेख में लिखा था:-

‘हिंदुस्तान के शासकों के रूप में असली चंगेज खां बन रहे हैं। अपने कब्जे की आबादी को ‘शांत करने के लिए’ वे सब कार्रवाईयां, यहां तक की हंटरों की वर्षा, कर सकते हैं...लेकिन देशी लेखकों और राजनीतिक नेताओं की रक्षा के लिए हिंदुस्तान की जनता ने सड़कों पर निकलना शुरू कर दिया है। अंग्रेज गीदड़ों द्वारा हिंदुस्तानी जननेता तिलक को दी गई घृणित सजा, थैलीशाहों के गुलामों द्वारा एक जननेता के खिलाफ की गई बदले की कार्रवाई की वजह से बंबई की सड़कों पर प्रदर्शन और हड़ताल हुई है। हिंदुस्तान का सर्वहारा वर्ग भी इतना काफी वयस्क हो चुका है कि एक वर्ग-जागृत राजनीतिक संघर्ष चला सके। अंग्रेजी शासन के भारत में दिन लद गए'। 

इन शब्दों की रचना के ज़रिए लेनिन ने भारतीय वेदना के चीत्कारों को दर्ज़ कर अपना क्षोभ और गुस्सा ज़ाहिर किया था। जिस दौर में रूस स्वयं अनेकानेक विसंगतियों से गुज़र रहा था। उस दौर में सोवियत संघ के राष्ट्रप्रमुख ब्लादिमीर लेनिन ने भारत की आज़ादी की लड़ाई का खुलेआम समर्थन किया था। तक़रीबन 17 अक्टूबर 1920 में जब भारतीय क्रांतिकारियों ने लेनिन के राह पर आंदोलन के लिए काबुल में मुलाक़ात की थी तो उसे लेनिन ने बजाप्ता समर्थन करते हुए लिखते (https://www.marxists.org/archive/lenin/works/1920/may/13b.htm) हैं कि 

‘मुझे यह सुनकर खुशी हुई कि उत्पीड़ित जातियों के लिए आत्मनिर्णय और विदेशी और देशी पूंजीपतियों के शोषण से मुक्ति के सिद्धांतों को, जिन्हें मजदूर-किसान जनतंत्र ने घोषित किया है, अपनी स्वतंत्रता के लिए वीरतापूर्वक लड़ रहे सचेत हिंदुस्तानियों के बीच इतना हार्दिक स्वागत प्राप्त हुआ है। रूस के मेहनकतश जनसाधारण हिंदुस्तानी मजदूरों और किसानों के जागरण का सतत ध्यानपूर्वक अवलोकन कर रहे हैं। सारे संसार के मेहनतकशों के साथ एकजुटता अंतिम विजय की गारंटी है। हम मुसलमान और गैर मुसलमान तत्वों की घनिष्ठ संघबद्धता का स्वागत करते हैं। जब हिंदुस्तानी, चीनी, कोरियाई, जापानी, फारसी, तुर्क मजदूर और किसान कंधे से कंधा मिलायेंगे और मुक्ति के एकसमान ध्येय के हेतु साथ-साथ आगे बढेंगे, केवल तभी शोषकों पर निर्णायक विजय सुनिश्चित होगी'।

लेनिन के भारतीय सहयोग की नीति को आगे बढ़ाते हुए लेनिन की मृत्यु के उपरांत सोवियत संघ ने भारत में भगत सिंह,चंद्रशेखर आज़ाद द्वारा बनाई गई पार्टी HSRA(हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी) के कार्यकर्ताओं को बम-हथियार आदि बनाने की ट्रेनिंग दी थी। भगत सिंह,सुखदेव, राजगुरु आदि नेता लेनिन के बड़े प्रशंसक थे तभी भगत सिंह अपने फाँसी के चंद क्षण पहले लेनिन की पुस्तक पढ़ रहे होते है। ध्यानाकर्षण तो इस बात को लेकर भी है कि मुकदमे के सुनवाई के दौरान 21 जनवरी को लेनिन दिवस था, मुँह पर लाल रुमाल बांधे हुए भगत सिंह,राजगुरु,सुखदेव ने अदालत के भीतर ‘समाजवादी क्रांति जिंदाबाद', 'कम्युनिस्ट इंटरनेशनल जिंदाबाद', ‘जनता जिंदाबाद,’ ‘लेनिन का नाम अमर रहेगा,’ और ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारे लगाए। 

ये अराजक मूर्तितोड़ तंत्र बालगंगाधर तिलक, भगत सिंह सुखदेव, राजगुरु आदि कालजयी महावीरों के उपासक होने का दावा करते हैं जबकि इन्हें लेनिनवादी विचार, लेनिन का व्यक्तित्व से नफ़रत है। नफ़रत का स्तर ये है कि लेनिन की धूल से आधी लिपि हुई मूर्ति भी बर्दाश्त नहीं हो पाई। यह विडंबना ही है कि भगत सिंह और लेनिन के विचारों से असहमति रखने वाले गाँधी भी लेनिन के मुरीद थे। गाँधी लेनिन के रसिया क्रांति के आलोचक होते हुए भी लेनिन के लिए लिखते हैं:- ‘लेनिन जैसे प्रौढ़ व्यक्ति ने अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया था, ऐसा महात्याग व्यर्थ नहीं जा सकता और उस त्याग की स्तुति हमेशा की जाएगी'। 

लेकिन यही दुर्भाग्य है इस दौर का कि विरोधों का कोई प्रामाणिक आयाम नहीं है। विरोध का कोई ठोस तथ्यात्मक तर्क भी नहीं है। केवल मानसिक कुंठा की जड़ताओं से ग्रसित है कि 'विरोध करना है'। ऐसे समय में बौद्धिक विमर्शों का क्या आयाम होगा और कितनी तादात उसका अनुसरण करेगी।।

Friday, March 23, 2018

भगत सिंह के फाँसी के लिए गाँधी-नेहरू के निष्ठा पर सवाल कब तक ?

23 मार्च भारत के तीन वीर सपूतों के बलिदान का दिवस है और आजाद भारत में समाजवाद के प्रबल प्रवर्तक और पंडित नेहरू के धुर विरोधी  डॉ राममनोहर लोहिया का जन्म दिवस भी है, लेकिन समाजवाद, बहुजनवाद तथा वामपंथी के संरक्षक इसे लोहिया के जन्मदिवस के तौर नहीं मनाते हैं। स्वयं डॉ लोहिया ने इस दिन को बलिदान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया था। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को इसी दिन लाहौर जेल में फांसी दी गई थी। समूचे देश में अंग्रेजों के विरुद्ध आक्रोश का उफान था। संयुक्त भारत के शहरों, कस्बों, गांवों में उनके बलिदान की ही चर्चा थी। लाहौर षड्यंत्र केस के दौरान अपने मुकदमों की पैरवी भगत सिंह स्वयं किया करते थे। यह बहस इतनी प्रसिद्ध और रोचक हो चली थी कि मोतीलाल नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, पंडित जवाहरलाल नेहरू और रफी अहमद किदवई जैसे सरीखे नेता भी कई अवसरों पर लाहौर कचहरी में दर्शक एवं श्रोता बन भगत सिंह को देखा और सुना करते थे। भारत नौजवान सभा का घोषणापत्र और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के समय-समय पर प्रकाशित दस्तावेज भगत सिंह और उनके साथियों की विचारधारा की स्पष्टता बयान करते हैं। वे न सिर्फ बलिदान, साहस और वीरता के प्रतीक थे बल्कि वे प्रखर समाजवादी और धार्मिक संकीर्णता के कट्टर विरोधी भी थे। 

भगतसिंह के अनुसार ‘‘समाज का वास्तविक पोषक श्रमजीवी है। जनता का प्रभुत्व मजदूरों का अंतिम भाग्य है। इन आदर्शों और विश्वास के लिए हम उन कष्टों का स्वागत करेंगे, जिनकी हमें सजा दी जाएगी। हम अपनी तरुणाई को इसी क्रांति की वेदी पर होम करने लाए हैं, क्योंकि इतने गौरवशाली उद्देश्य के लिए कोई भी बलिदान बहुत बड़ा नहीं है"। भगत सिंह के उस बलिदान और क्रांति के अलख के वजह से ही आज लोगों में सत्ता से सवाल पूछने का साहस जुटा पाता है।

लेकिन जब भी गाँधी-नेहरू की बात होती है भगत सिंह के संदर्भ में तो अक्सर लोग यह गाँधी-नेहरू के निष्ठा पर सवाल खड़ा कर देते हैं कि गाँधी-नेहरू ने भगत सिंह को बचाने की कोशिश नहीं की। ये दोनों चाहते तो भगत सिंह को बचाया जा सकता था लेकिन इन्होंने बचाने की चेष्टा नहीं की। और भी कई भ्रामक संदर्भ गिनाने लगते हैं। व्यस्त न होता हूँ तो सच्चाई से रूबरू करा देता हूँ लेकिन सामने वाले विचार में जड़ता देखता हूँ तो चेहरे पर मंद मुस्कान देकर शांत हो जाता हूं। बहरहाल आज गाँधी-नेहरू के भगत सिंह के फाँसी के संदर्भ में असल कोशिश और निष्ठा का वर्णन करूँगा ताकि आज हिमालय के भांति ऊँचे व्यक्तित्व के महापुरुषों को असल श्रद्धांजलि अर्पित कर सकूँ।

* सर्व प्रथम सुभाष चंद्र बोस के द्वारा संप्रेषित प्रमाण को प्रस्तुत करता हूँ। सुभाष चंद्र बोस ने अपनी पुस्तक 'भारत की स्वाधीनता' में लिखा है- "महात्मा जी ने भगत सिंह को फाँसी से बचाने की पूरी कोशिश की अंग्रेजों के गुप्तचर को पता चला कि यदि भगत सिंह को फांसी दे दी जाये तो उसके फलस्वरूप हिंसक आंदोलन उभरेगा, अहिंसक गांधी खुलकर हिंसक आंदोलन का पक्ष नहीं ले पाएंगे तो युवाओं में आक्रोश उभरेगा और वे कांग्रेस और गांधी से अलग हो जाएंगे।इसका असर भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को समाप्त कर देगा। लेकिन भारतीय जनता ने अंग्रेजी साम्राज्यवादी चाल को विफल कर दिया। हालांकि कुछ नवयुवकों ने आक्रोश में आकर काले झण्डों के साथ प्रदर्शन किया पर उसके बाद ही हिंसक आंदोलन का अंत हो गया था।" यह सच है अपनी ज़िंदगी में पहली बार गाँधी जी ने किसी व्यक्ति (भगत सिंह) के लिए सज़ा कम करने की माँग की थी, महात्मा ने स्वयं वाइसराय से मिलकर लिखित रूप में अपील की कि भगत सिंह की फाँसी रोक दी जाये। लेकिन समय से पहले ही करांची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन प्रारम्भ होने से से पहले ही फांसी देने का एक मात्र मकसद था गांधी के प्रति नवयुवकों में विद्रोह पैदा करना। 

भगत सिंह स्वयं फांसी के पूर्व अपने वकील से मिलने पर कहा था - मेरा बहुत-बहुत आभार पँ नेहरू और सुभाष बोस को कहियेगा ,जिन्होंने हमारी फाँसी रुकवाने के लिए इतने प्रयत्न किया।

*भगतसिंह के पिता सरदार किशन सिंह जी जिन्होंने 23 मार्च को अपना पुत्र खोया था 26 मार्च को कांग्रेस अधिवेशन में लोगों से अपील कर रहे थे- "आपलोगों को अपने जेनरल महात्मा जी का और सभी कांग्रेस नेताओं का साथ जरूर देनी चाहिए। तभी आप देश की आजादी प्राप्त करेंगे।इस पिता के उदगार के बाद पूरा पंडाल सिसकियों में डूब गया था। पँ नेहरू, पटेल, मालवीय जी के आँखों से आंसू गिर रहे थे। 

लेकिन भ्रामक भ्रांतियां फ़ैलाने वाले लोग असल बातों को छुपा कर देश के सामने गाँधी-नेहरू-बोस आदि नेताओं के निष्ठा पर ही प्रश्नवाचक चिन्ह लगा दिया कि उन्होंने भगत सिंह के फाँसी रोकने के लिए कुछ नहीं किया। लेकिन जब तक हम जैसे लोग रहेंगे तब तक हर भ्रामक तर्कों को वास्तविक तथ्यों से ख़ारिज करने की जुगत में डटे रहेंगे। और शायद यही असली सम्मान अर्पित करना होगा भगत सिंह को। भगत सिंह ने जिन्हें मारने के पूर्व भी सम्मानित तौर से धन्यवाद कहा था उनके नाम पर ही उन लोगों के निष्ठा पर कैसे सवाल कर सकते हैं।

Sunday, February 18, 2018

कश्मीर किसकी प्रतिबद्धता- नेहरू या पटेल

तमाम सुनियोजित कोशिशों और धारणाओं की देन है कि कश्मीर विवाद का नाम सुनते ही ज़हन में देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू के असफलता का प्रतिविम्ब उभरने लगता है। नागरिक सोच कर व्यथित हो उठते हैं कि काश उस विवाद पर समझौता का अवसर  देश के पहले गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल को मिला होता तो आज कश्मीर और पाक-अधिकृत कश्मीर भी भारत में ही होता। किन्तु मामला केवल उस व्यथित विचलन के कल्पना भर का नहीं है। बल्कि मामला इतिहास के सच्चे शोध और तथ्यात्मक संदर्भों को जानने की आवश्यकता का भी है। इतिहास का काल स्वर्णिम हो या भयावह किन्तु वह होता कालजयी ही है। कुछ विशेष वैचारिक परिधि के भीतरी लोग जिनकी ऐतिहासिक जानकारियां तथ्यहीन होती है लेकिन इतिहास के शोधार्थी होने का दावा भी करते है। दरअसल गलती उनके ऐतिहासिक बोध को लेकर नहीं है बल्कि गलती उनके उस आलस्यपन को लेकर जो उन्हें संदर्भ ग्रंथों के पृष्ठों को पलटने से रोकती है। इस कारण विमूढ़ों के अतार्किक तर्जुमाओं का अनुसरण करना ज्यादा मुनासिब समझते हैं। मसलन ऐसी कुटिल ज्ञान ही इन्हें कुपमंडूक का पात्र बना देती है।

इसी कश्मीर के समझौता बनाम विवाद के मसले पर एक तथ्यात्मक संदर्भ आपलोगों से साझा कर रहा हूँ। भाजपा नेता व भारतीय विदेश राज्यमंत्री एम.जे.अकबर  ने 1991 में एक पुस्तक लिखी है। पुस्तक का नाम है "कश्मीर बिहाइंड द वेल" जिसके पेज संख्या '95' पर उन्होंने लिखा है-

"पटेल और नेहरू में कश्मीर को लेकर महत्वपूर्ण मतभेद था। पटेल साम्प्रदायिक विभाजन के मद्देनजर मानसिक रूप से कश्मीर को भारत में शामिल करने का विचार त्याग चुके थे। लेकिन शेर ए कश्मीर 'शेख अब्दुल्ला' के कारण पंडित जवाहरलाल नेहरू कश्मीर को भारत में शामिल करने के लिए ऐड़ी-चोटी एक कर चुके थे"।

इस पुस्तक के लेखक M.J AKBAR मौजूदा वक़्त में भाजपा दल से राज्यसभा सांसद हैं। भारत के केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री भी हैं। उन्होंने तक़रीबन 10 पुस्तकें लिखी है। राष्ट्रीय से लेकर अंतराष्ट्रीय अखबारों के वरिष्ठतम अथवा संपादक पद पर पत्रकारिता किया है। उन्होंने पुस्तक में तथ्यों और तर्कों को बजाप्ता संदर्भों के साथ चिन्हित किया है। लिहाज़ा यदि उनके उपर्युक्त संप्रेषित तथ्यों पर ऐतबार किया जात है तो क्या उनके पार्टी के  विचारक उनके तथ्यों को सही मानेंगे। क्या वो लोग कश्मीर विवाद के ठीकरा को नेहरू पर फोड़ने से बचेंगे या फिर अभी भी पटेल को समझौता न करने देने के मलाल से नेहरू को ही कोसेंगे। इस अंतर्विरोध और द्वैदात्मक चयन के क्या मायने निकाले जाएं।

Saturday, February 3, 2018

'अंतर्धार्मिक प्रेम के शिकार' अंकित से माफ़ीनामा पत्र ।

प्रिय अंकित,

ज़रा सी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूँ कि तुम्हारे मरणोपरांत तुम्हें माफ़ीनामा लिख सकूँ। लेकिन फिर भी हिम्मत जुटा कर लिख रहा हूँ जिसके ज़रिये तुम से माफी मांग पाऊँ। तुम्हारे चले जाने के अपराधबोध के कशमकश में अजीबोगरीब घुटन महसूस कर रहा हूँ। तुमसे माफी माँगने के लिए बेचैन हूँ। माफ़ी इसलिए माँग रहा हूँ, क्योंकि हमने तुम्हें एक ऐसा समाज दिया जहाँ मोहब्बत करने की स्वतंत्रता तक नहीं है। मानवनिर्मित धर्म और जाति के छद्म गुरुर ने प्राकृतिक प्रेम के स्नेह को बर्दाश्त नहीं कर सका। इसलिए धार्मिकता और जातीयता के इस छद्म गौरव ने आज तुम्हें भी लील लिया। दरअसल अंकित तुम जैसे कई लोग इश्क़ के ज़रिए इस वर्गीकृत समाज को चुनौती देता है। किन्तु धर्म और जाति का झूठा दंभकारी मानसिकता तुम जैसे निरीह प्रेम के उपासकों को मार देता है। अंकित यह हत्या केवल तुम्हारी नहीं हुई है, बल्कि यह हत्या उस स्वप्न की है जो तुम जैसे अनेकों युवा जाति और धर्म के झूठे आडंबर के खांचों से बाहर निकल कर अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह करते है। व्यथित इस बात को लेकर भी हूँ कि क्या ऐसी मज़हबी मगरूरियत हमारे समाज के भीतर सहिष्णुता और एकता को पनपने देगी। क्या यह संभव है कि मोहब्बत करने से पहले प्रेमी-प्रेयसी जाति,धर्म,गोत्र आदि पर आपसी तालमेल कर मोहब्बत की नुमाईश कर सके। मोहब्बत तो केवल वक़्त की साज़िश है जो न जाने कब हमारे भीतर एक अपनेपन का एहसास भर देती है और हमें पता भी नहीं चलता। उस साज़िश का अंतिम परिणाम अपने मोहब्बत  को पाने के जुनून में तब्दील हो जाता है। लेकिन जाने क्यूँ मोहब्बत का यह निरीह एहसास उस मगरूरियत समाज को खटकने लगता है। जिसकी कीमत अंकित तुम्हारे जैसे युवा को अपने मौत से चुकाना पड़ता है। जब से तुम्हारे मौत के कारण को जाना हूँ तब से स्तब्ध हो गया हूँ। ज़हन में तुम्हारे हत्या की काल्पनिक तस्वीर निरंतर परेशान कर रही है। तुम्हारे माँ की हालात को देख भावुकता से बेचैन हो गया हूँ। यह सोचकर रोंगटे खड़े हो रहे है कि उस वक़्त उस माँ की स्थिति क्या होगी। उनके जीवन का वह भयावह क्षण कितनी अतिरेकपूर्ण उनके जीवन के उम्मीद को खत्म कर रहा होगा।
अंकित हम तुम्हारे गुनहगार है। हमने तुम्हें वो समाज नहीं दिया जहाँ तुम अपनी मर्ज़ी से इश्क़ कर सको। लेकिन सीने पर इस अपराधबोध के साथ भी गुज़ारिश करता हूँ कि तुम अगले जन्म में आकर इस धरती पर मोहब्बत के एक नए इबारत को लिखना। जिससे समाज में प्रेम के उपासकों का एतबार बना रहे। इस पृथ्वी पर प्रेम की बहुत कमी है अंकित। और इस प्रेम को तुम जैसे हिम्मती लोग ही पृथ्वी पर भर सकते है। क्योंकि मोहब्बत करने वाला बागी होता है और वो समाज के विमूढ़ परंपरा को चुनौती देकर उस घृणित मानसिकता के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत करता है। तुम तो जीवित ही मोहब्बत फैलाने वाले एक सफ़ल अनुयायी साबित हुए। अगले जन्म तुम फिर मोहब्बत के अनुयायी बनकर ही आना। हमलोग कोशिश करेंगे कि शायद कुछ प्रतिशत इस घृणित सोच को कम कर सके।

तुम्हें एक स्वतंत्र समाज न देने वाला एक अपराधबोधि।।

Monday, January 8, 2018

पत्रकारों और लेखकों पर हुक़ूमती एफआईआर क्या अभिव्यक्ति और फासीवाद की टकराहट है !

पहले भी कई बार लिख चुका हूँ आज पुनः उसे दोहराना चाहता हूं कि मरना केवल श्मशान में जलना या कब्र में दफन होना नहीं होता है, बल्कि मरना वो क्रिया भी है जिस क्षण आप डर से लिखना, बोलना और सोचना छोड़ देते हैं। द ट्रिब्यून नाम के एक अंग्रेज़ी अखबार की रिपोर्टर एक खबर में लिखती हैं कि देश के नागरिकों का आधार डाटा 500 रुपये में बेचा जा रहा है। इस पर UIDAI नाम की सरकारी संस्था ने उस रिपोर्टर के अलावा तीन और लोगों पर एफआईआर दर्ज करवा दी है। कुछ विशेष विचारधारा के बौद्धिक गुलाम उस रिपोर्टर पर एजेंडा पत्रकारिता का आरोप भी लगा रहे हैं। किसी पर भी आरोप-प्रत्यारोप लगाना लोकतांत्रिक देश में अनैतिक नहीं है, लेकिन विषय को विषयांतर करना निश्चित रूप से एक अनैतिक साज़िश है। खैर, अब मुख्य विषय पर आता हूं। पत्रकारों पर केस दर्ज़ करने का मामला यह नया नहीं है, आधार से ही जुड़े मामले में इस संस्था ने मार्च 2017 में CNN-NEWS18 के एक पत्रकार पर केस दर्ज किया। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी रिपोर्ट का खुलासा करने पर पत्रकारों पर केस करना न्यायसंगत है? क्या किसी सरकारी संस्था अथवा सत्तारूढ़ लोगों की पारदर्शिता पर सवाल उठाना ईशनिंदा से भी अधिक गंभीर और संवेदनशील विषय है? फिर अगर पत्रकार संस्थानों की स्वायत्तता और पारदर्शिता पर सवाल नहीं उठाएगा तो क्या पत्रकारिता का बुनियादी अस्तित्व भी बचेगा? जब हुकूमत अपने अनुयाई संस्थानों से पत्रकारिता को नष्ट करने या अपने आगे नतमस्तक होने का ही विकल्प रखे तो देश का लोकतंत्र किसके भरोसे जीवित रहेगा? पत्रकारों के पास कोई विशेष अधिकार नहीं होता है। पत्रकार भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत ही सवाल करते है और संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के उपखंड क और ख उनकी भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं। संविधान निर्माण के समय सेंट्रल हॉल में पत्रकारों को विशेषाधिकार देने की बात कही गयी थी। तब की प्रारूप समिति के अध्यक्ष बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि पत्रकारों को विशेष अधिकार देना नुकसानदेह होगा, क्योंकि हमारे संविधान में अनुच्छेद 19 (1) (क )में दर्ज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर नागरिक को यह लोकतांत्रिक अधिकार देती है। लेकिन जिस तरह से पत्रकारिता के आवाज़ को दबाया जा रहा है और पत्रकारों को एफआईआर के ज़रिये डराया जा रहा है, वह देश के नागरिकों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण क्षण की शुरुआत है। इसे निश्चित रूप से फासीवाद का आहट माना जा सकता है। मेरी उन सामाजिक चिंतकों, लेखकों, साहित्यकारों, कलाकारों और पत्रकारों से गुज़ारिश है कि हुकूमत की इन प्रवृत्तियों का विरोध करें जो सत्ता के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले को कुचलने की कोशिश करती हैं। कुछ बौद्धिक गुलाम आपको यह भी तर्क देंगे कि सरकार अथवा उनके संस्थान आप पर झूठा केस दर्ज कर रहे हैं तो कोर्ट में आप अपना सही पक्ष रखिये, इसमें इतना चिल्लम-चोट क्यों किया जा रहा है? तो ऐसे लोगों को मेरा यही जवाब है कि क्या एक अदने से पत्रकार अथवा लेखक की यह हैसियत है कि वह अपने ऊपर लगाए गए आरोपों का जवाब देने के लिए किसी वकील अथवा न्यायिक प्रक्रिया के खर्च का आर्थिक बोझ उठा सके? वो न्यायालय में ही अपना वक्त और पैसा खर्च करता रहेगा तो अपने घर-परिवार का खर्च कब और कैसे उठाएगा? सरकार के पास तो सरकारी खजाना, वकील और अटॉर्नी जनरल भी हैं, लेकिन एक पत्रकार के पास क्या है? इसलिए जो वर्ग साहित्यिक लेखन, सामाजिक चिंतन अथवा पत्रकारिता करने आए हैं, वो इस अभिव्यक्ति के कुचलने की प्रवृत्ति के खिलाफ आवाज़ उठाएं और जो केवल ग्लैमर या चकाचौंध से आकर्षित होकर आए हैं, उनसे क्या अपेक्षा करना। वो तो चकाचौंध की तलब में सत्ता के आगे बिछने को तैयार बैठे ही होंगे। लेकिन देश के नागरिकों के लिए सोचने का वक्त आ गया है, वह इस फासीवादी आहट को सुनने की कोशिश करें। क्योंकि फासीवाद कभी ढ़ोल-नगाड़े बजा कर नहीं आता है बल्कि इन्हीं दमनकारी प्रवृत्तियों के ज़रिये मुल्क में प्रवेश करता है और फ़ासीवादी विचारधाराओं का विस्तारीकरण करता है।

Tuesday, December 26, 2017

क़ायद ए आज़म पर शोध का अनुभव (एक संक्षिप्त विवरण)

किसी भी व्यक्ति, शब्द, वस्तु आदि को हम उसी रूप में ज्ञात करते हैं जैसी उसकी धारणा हमारे बीच में गठित की जाती है। जैसे उसके व्यक्तित्व व गरिमा को निरूपित किया जाता है। कोई भी धारणा तक्षणात नहीं बनती है बल्कि वह आहिस्ता-आहिस्ता लोगों के बीच में व्यवहारिकता से ठोस धारणा में तब्दील होती है। ठोस धारणा का सबसे बड़ा प्रमाण यह होता है कि जब कोई व्यक्ति उस धारणा की समीक्षा या उसके विरोध में खड़ा होने की कोशिश करे तो उसी समाज के कुछ लोग उस स्मृत धारणा को आखरी सत्य मान कर उस समीक्षक विरोधी का हिंसक या अहिंसक रूप से एतराज़ जताने लग जाता है। यदि ऐसा होता है तो समझ जाइये की धारणा अब अच्छी तरह पक कर प्रबल हो चुकी है। वह धारणा अब ज्वालामुखी के तरल लावा से ठोस चट्टान बन चुकी है। मसलन यही कुछ एक धारणा हमारे देश में एक व्यक्ति मोहम्मद अली जिन्नाह उर्फ क़ायद ए आजम को लेकर बनी है। और ऐतिहासिक कालखंड को जानकर राष्ट्रीय एकता के लिए जिन्ना को दुश्मन समझना जरूरी भी है। क्योंकि इतिहास की अपनी एक विशिष्टता है। इतिहास घटनाओं को दर्ज़ करता है जज़्बातों को नहीं। मोहम्मद अली जिन्नाह क्या सोचते थे वह दर्ज़ नहीं होता है बल्कि उस वक़्त क्या धटनाएं हुई वह दर्ज़ हुआ है। लिहाज़ा इतिहास में दर्ज़ फैसलों व तारीख़ों के आधार पर वह व्यक्ति देश का दुश्मन है। वह आज़ादी के ज्वलंत आखरी एक दशक में अलग मुल्क की मांग कर बैठा। उसकी असाधारण नेतृत्व को देखकर अंग्रेजी सल्तनतों को भी इस मांग पर विचार करने को मजबूर कर दिया था और अंतत: वह अपने इस माँग में कामयाब भी रहे। शायद इन्हीं कारणों के वजह से जिस तरह हमारा भारतीय समाज राम का चिर दुश्मन रावण, कृष्ण का कंस, पांडव का कौरव को मानता है ठीक उसी प्रकार गाँधी-नेहरू के भारत का चिर दुश्मन जिन्ना के रूप में देखता आया है। कुछ इसी तरह अंग्रेजी लेखक शशि थरूर ने अपने पुस्तक 'द ग्रेट इंडियन नावेल' में आज़ादी के लिए आंदोलन को व्यंगात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है जिसमें जिन्ना को कर्ण के पात्र से रंगा है। इतिहास की कुछ पुस्तकों को पढ़ कर जाना कि जिन्ना दादा भाई नौरोजी से आज़ादी आंदोलन के लिए प्रेरित हुए। तदोपरांत वह अपने लंदन के सफल जीवन को छोड़ कर भारत के उपेक्षित आंदोलन में शामिल हुए। भारत आकर जिन्ना ने अपना राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले को माना और यही कारण था कि गोखले की मृत्यु का असर जिन्ना पर काफी दिनों तक पाया गया। बस ऐसे ही कुछ प्रारंभिक व बुनियादी तथ्य मुझे जिन्ना को नए सिरे से तलाशने के लिए बेचैन कर दिया था। मैं जानना चाहता था कि गांधी-नेहरू से पहले भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने वाला वह नेता जिसके भाषणों तथा कचहरी में ज्ञाननुमा तार्किक बहस से अंग्रेजी सल्तनत तक की नींवें हिल जाती थी। अंग्रेजों के लाख कोशिशों के बाद भी उसने अपने भारतीय स्वंत्रता आंदोलन पर शुरुआती दिनों में धर्म और मज़हब का प्रभाव नहीं पड़ने दिया था। जिसने भारतीय स्वंत्रता आंदोलन में कई ठोस प्रस्तावित मांगों को अंग्रेज़ों से मनवाया था। जिसने सबसे पहले भारत की राजनीतिक सहभागिता के लिए अंग्रेजों से भारतीय नागरिकों के हक़ के लिए सीटों की मांग की और अपने तर्क शक्ति से प्राप्त भी कर चुका था। जिसके व्यक्तित्व की सरोजनी नायडू कायल थीं और अपने लेखों व कविताओं के माध्यम से जिन्ना को कई दफ़ा बता भी चुकी थी। इतनी साकारात्मक विशेषता के बावजूद आखिर वह व्यक्ति आज़ादी के आखरी दौर में क्यों भारत का खलनायक साबित हो गया। आखिर किन महत्वकांक्षाओं की बेचैनी ने उसे ऐसा करने पर मजबूर कर दिया। ऐसी कौन सी बात ने उसके ज़ख्मी स्वाभिमान को चोटिल कर दिया। किन वज़हों से वह अलग मुल्क़ की मांग पर हठ कर बैठा। जो जिन्ना अपने व्यापक ज्ञान के वजह से जाती-धर्म के ऊपर रहता था वो जिन्ना आखिर किन कारणों से एक खास मज़हब का नुमाइंदा तक बन कर सीमित रह गया। आज़ादी के आखरी दशक में जिन्ना की ज़ुबान से नफ़रत की अम्ल क्यों बहने लगी था। दरअसल इन सभी प्रश्नों के उत्तर की बेचौनी ने मुझे परेशान कर दिया था। मैं स्वयं के प्रश्नों का जबाब स्वयं के भीतर थोड़ी बहुत अर्जित ज्ञान से ही तलाशने की कोशिश करता था। उन प्रश्नों का जवाब मैं तार्किक व तथ्यात्मक ढ़ंग से ढ़ूँढ़ता था बिना किसी पुर्वाग्रह के। लेकिन जब थोड़ी बहुत परिपक्वता आई तो जिन्ना को जानने की जिज्ञासा वाली बेचैनी को शांत करने के लिए मैंने एक अनुसंधान प्रारंभ किया। उस अनुसंधान के लिए कई पौराणिक दस्तावेज़ व अनेकों पुस्तकों को पढ़ा। जिनमें से कुछ खास पुस्तकों का नाम आप प्रबुद्ध पाठक के साथ साझा भी करना चाहता हूं ताकि आप भी चाहे तो पढ़ सकें। जो निम्नलिखित है:-
*Partition of India- legend and reality (H.M sirwai).
*India from Curzon to nehru & after -(Durga das).
*Roses in December- (Md qarim chhalgal).
*Understanding the Muslim mind - (Rajmohan Gandhi).
*Pakistan: Birth and Early days - (shri parakasa)
*India wins freedom- (Maulana abul kalam aazad).
*Guilty man of India's partition -(Ram manohar lohiya).
और आखरी जो पुस्तक मेरे अन्तः चेतना को झकझोर कर रख दिया है। वह है जिन्ना के आखरी वक़्त में सेना के डॉक्टर कर्नल इलाहीबख्श के लिखित संस्मरण "Quaid e azam is during his last days". इस पुस्तक में लेखक ने जिक्र किया है कि क़ायद ए आज़म ने अपने ज़िंदगी के आखरी दिनों में गहरे उदासी के साथ कहा कि "डॉक्टर पाकिस्तान मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल है।" हालांकि जब defense of idea of Pakistan Act बना तो 1978 के बाद उस पुस्तक के दूसरे संस्करण से इस वाक्य को हटा दिया गया था। खैर, जिन्ना लियाक़त अली के स्वार्थ को भांप चुके थे और लियाक़त उन्हें चाय से मक्खी सरीखे बाहर फेंक चुका था। वो पाकिस्तान की आज़ादी के कुछ दिनों के बाद ही भयानक रूप से बीमार होकर एकान्तवास में विदेश चले गये थे जहाँ उन्हें कोई भी पाकिस्तानी नेता खास करके उनका उत्तराधिकारी लियाक़त अली तक आखरी मुलाकात करने नहीं गया था। दुर्दांत क्षण तो वह था जब जिन्ना अपने एकदम आखरी दिनों में पाकिस्तान आए तो कोई भी उन्हें हवाई अड्डा पर स्वागत करने नहीं पहुंचा था।वहां से वो अपनी छोटी बहन फ़ातिमा जो उनकी एकमात्र सेविका थी के साथ खटारा एम्बुलेंस में सवार हो कर करांची के लिए चल पड़े।तब तक जिन्ना की हालत बेहद खराब हो चुकी थी।रास्ते में एम्बुलेंस खराब हो गई,बहन फ़ातिमा किसी अन्य गाड़ी के इन्तेज़ामात में लगी हुई थी। उस दौरान भीषण गर्मी पड़ रही थी। लिहाज़ा एम्बुलेंस का दरवाज़ा खुला हुआ था और जिन्ना के शरीर पर मक्खियां लग रही थी किन्तु जिन्ना के शरीर में इतनी भी ताक़त नहीं थी कि वह मक्खियां उड़ा पाते। इसी तरीके से उनका आखरी काल बड़ा ही भयावह गुज़रा है। जिससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अतिउत्साहित होकर एक छोटी सी गलती पूरे जीवन को नर्क में कैसे तब्दील कर देती है। शोध तो बहुत अधिक कर लिया हूँ जिसे भविष्य में पुस्तक का भी रूप देने पर विचार करूँगा। इसलिए ज्यादा विस्तृत जानकारी न देकर बिल्कुल बुनियादी जानकारी दिया हूँ।ताकि आपके भीतर वह जिज्ञासा पैदा कर सकूं। बहरहाल, इस शोध के आखरी वक़्त तक पहुंचते-पहुंचते मैं वर्तमान से दूर हो चुका था। दिन हो या रात हो,जगा हूँ या सोया हूँ लेकिन मेरे दिमाग में वो ही घटनाएं फ़िल्म की तरह चलती रहती थी। मैं लोगों के बीच में बैठकर भी स्वयं को बम्बई के कार्यकारी अधिवेशन में महसूस करता था। नज़रो के समाने उस दौर के नेताओं के संघर्ष पारदर्शी होकर गुजरता रहता था। किंतु धीरे-धीरे ध्यान योग और एकाग्रता के साथ उस आभासी मानसिक दुनिया से निकल कर वर्तमान में आ गया । इस विषय के संदर्भ में अपने अगले कड़ी में कुछ घटनाओं का विस्तृत रूप से जिक्र करूँगा।फिलहाल इस पोस्ट के माध्यम से आपलोगों को यह बताना चाहता था कि मेरा शोध समाप्त हो गया और अब मैं कुछ दिनों के बाद अगले किसी धारणा के विरुद्ध वाले विषय पर अनुसंधान करूँगा।क्योंकि मैं अपने परिचय में भी यही लिखा हूँ कि "एक ढ़ीठ हूँ जो निरंतर अवधारणाओं के हवेली को व्यवहारिकता के तर्क से धराशायी करने को प्रयासरत रहता हूँ"।

Saturday, December 16, 2017

ज़ायरा पर छींटाकशी पितृसत्तात्मक ग्रंथि का बौखलाहट है..

आज फिर महिला सुरक्षा और समानता का अधिकार पितृसत्तात्मक मानसिकता के हाथों दम तोड़ दिया। मामला अभी प्रशासनिक अन्वेषण में है कि कश्मीरी स्थानिक ज़ायरा वसीम के साथ सच में आरोपी ने कामुकतापूर्ण उत्पीड़न किया है या नहीं। सारी कार्रवाइयाँ प्रशासकीय निर्देशन में की जा रही है। लेकिन देश के भीतर पितृसत्तात्मक दंभकारी सोच से कुंठित एक वर्ग ऐसा भी है जो बौखलाहट में ज़ायरा वसीम को कोस रहा है। अब जब किसी पुरुष नामक प्रजाति पर किसी महिला के द्वारा कामुकतापूर्ण उत्पीड़न का आरोप लगा है तो स्वाभाविक सी बात है उस बौद्धिक प्रवृति वाले लोगों का बौखलाहट में होना। क्योंकि वह आरोप न केवल किसी दानव के द्वारा किसी मानव के ऊपर कुंठा शांत करने का है बल्कि उस आरोप ने एक ऐसे सामंती एकाधिकार जड़ित सोच पर हमला किया है जिसने सदियों से अपने संकीर्ण मानसिकता को अव्वल बनाकर पूरे समाज पर थोपा है। आपको याद होगा जब दंगल फ़िल्म आई थी तब ज़ायरा वसीम को फ़िल्मी पर्दे पर आने को लेकर कश्मीर के कुछ तथाकथित लोगों ने ज़ायरा का मान मर्दन किया था। अनेकों वीभत्सता पूर्ण अश्लील शब्दों का उपयोग ज़ायरा के लिए किया था। तब पूरे देश ने उस वक़्त ज़ायरा का समर्थन किया था और उन कुपमंडूको के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद किया था। उस समर्थन के ज़रिए देश ने कश्मीरियों के दिलों में एक रुमानियत और मोहब्बत का जगह पाया था। उसने राजनौतिक असन्तुष्टियों के अविश्वास से निकलकर भारत के नागरिकों पर विश्वास किया था। किंतु आज कुछ तथाकथित पितृसत्तात्मक मानसिकता वाले लोग जिस तरह से बिना किसी प्रशासनिक विवरण पाए ज़ायरा के ऊपर प्रख्याति तमाशा (पब्लिसिटी स्टंट) करने का आरोप लगा रहे है। उसे अन्य उपेक्षित क़सीदे, चुटकुलों और तंज़ के ज़रिए उसके व्यक्तित्व पर हमला कर रहे है, यह नैतिक दुर्बलता का परिचायक है। क्या पितृसत्तात्मक सोच का आख़री कूटनीति यही होता है कि जब उस सोच के संकीर्णता पर, उसके प्रभुत्व पर हमला हो तब आवाज़ उठाने वाले को चरित्रहीन अथवा अनैतिक करार कर दिया जाए। जो लोग इसे पब्लिसिटी स्टंट कह रहे है, क्या उनके पास इतना भी धीरज नहीं है कि वह प्रशासन के विवरण में जाँच के स्थितियों को स्पष्ट होने का इंतज़ार कर लें । क्या इस धीरज की कमी उस वर्ग के सदियों से ढ़ो रहे सड़ाँध और खोखले पितृसत्तात्मक सोंच पर हमले से बौखलाहट को प्रदर्शित नहीं करता है। इस सड़ाँध मानसिकता ने आज फिर उस नवजात विश्वास और मोहब्बत को नष्ट कर दिया। ज़ायरा वसीम केवल कश्मीर की बहन-बेटी नहीं है, बल्कि वह हर घर, हर परिवार में किसी अन्य नाम से बहन-बेटी के रूप में रहती है। जिसे हम सदैव सफल और सुरक्षित होने का आशीर्वाद देते है। फिर ज़ायरा के इस संघर्ष को पब्लिसिटी स्टंट कहना कितना सही है। कल को अगर ऐसी घटना किसी अन्य बहन-बेटियों के साथ हो जाए तो क्या तब भी वो लोग उन बहन-बेटियों पर ऐसे ही छींटाकशी करेंगे जिन शब्दों में आज ज़ायरा के साथ किया जा रहा है।