Tuesday, October 13, 2020

आध्यात्म से ही अकेलापन और डिप्रेशन को हराया जा सकता है!!

अकेलापन'... यह महज़ एक छोटा सा शब्द मात्र ही तो है। लेकिन यह लोगों की ज़िंदगी को ख़त्म करने के लिए काफी है। किसी भी इंसान को दर्द की त्रासदी से डिप्रेशन में भेजने के लिए मुकम्मल है। और दुर्भाग्य से यह आज विश्व की बड़ी आबादी के जीवन में इस शब्द ने ऐसी जगह बना ली है कि उनका जीवन दर्द के बवंडर से भर चुका है। कइयों की जिंदगी ख़त्म कर दी है। अकेलापन ज़िंदगी में आहिस्ता-आहिस्ता  आता है और ज़रा सा भी अपने आने का इल्म नहीं होने देता है। यह सबसे पहले आपको अपने ही लोगों से दूर करता जाता है। और अंत में सभी से दूर करता हुआ आपको ऐसे पड़ाव पर लाकर खड़ा कर देता है। जहाँ लगता है कि अगर आपने खुद को ख़त्म कर खुद से दूर नहीं किया तो यह दर्द आपको जीने नहीं देगा। अकेलापन दिमाग पर ऐसा हावी होता है कि लगता है मानो खुद की नज़रों में अपनी ही ज़िंदगी बोझिल लगने लगती है। कुछ भी पाने की उम्मीद ख़त्म हो जाती। ज़िंदगी इतनी नीरस बन जाती है कि सपने-अरमान की कोई जगह नहीं बचती है। दिमाग से सोचने की क्षमता, आँखों से नींद, हृदय से प्यार, अपनों से दुलार, चुनौतियों से लड़ने की शक्ति, संघर्ष की स्वीकार्यता, सब कुछ ख़त्म कर देता है। अकेलापन का जन्म स्वतः प्राकृतिक तौर पर नहीं होता है बल्कि यह किसी तरह की असफ़लता अथवा धोखे आदि के कोख से होता है। मेहनत की कमी से नाक़ामियाँ ऐसे हावी होती है कि इंसान अकेला-अकेला रहना शुरू कर देता है। उसे लोगों से डर लगने लगता है कि उसे कोई समझ नहीं पाएगा। उसे कहीं भी समझा नहीं जाएगा। वह खुद को बचाने के लिये खुद के भीतर अपनी नाकामियों को दबाने की जद्दोजहद करता रहता है। वो नाक़ामियाँ उसे अकेलापन के कुएं में धकेलती है। जहाँ सिर्फ अवसाद होता है। और वही अवसाद उसके दिलोदिमाग पर ऐसा हावी होता है कि वो ज़िंदगी को जीने से ज़्यादा मौत को गले लगाना सरल मानता है। अकेलापन का अवसाद रात के समय इंसान पर ज़्यादा हावी होता है। और उसे असहाय एवं लाचारगी का बोध कराता है।
आज हमारे आसपास में ज़्यादातर लोग अकेलापन के शिकार हैं। वह लोगों के बीच ज़बरदस्ती रहने की कोशिश करते हैं। सोशल मीडिया पर खुद को सबसे खुश और खुशनसीब दिखाने की मेहनत करते हैं। खुद ऐसे-ऐसे मोटिवेशनल कोट्स और विचार साझा करते हैं कि कोई भी अगर उसे पढ़ेगा तो यही लगेगा कि वाह, यह कितना सकारात्मक और सुलझा हुआ व्यक्ति है। इसकी ज़िंदगी में तो कोई दर्द, ग़म या अकेलापन की जगह ही नहीं है। जबकि उस इंसान से जब उसकी ज़िंदगी की सच्चाई सुनेंगे तो आपको पता लगेगा कि वो भले ही लोगों को मोटिवेशनल बातें शेयर कर के खुद को सकारात्मक दिखाने की कोशिश करता है। किंतु सच्चाई यह है कि उन मोटिवेशनल कोट्स के ज़रिए वह खुद को मोटिवेट करने की कोशिश करता है। और असल मायनों में उस इंसान को वाकई में सबसे ज़्यादा मोटिवेशन की ज़रूरत है। आप अपने आसपास के लोगों की ज़िंदगी में एक दफ़ा झाँकने की कोशिश कीजिये। उनके सोशल मीडिया हैंडल्स, उनके व्हाट्सएप स्टेटस को गौर से देखने की कोशिश कीजिये। आप पाएंगे कि मोटिवेशनल कोट्स व्हाट्सएप पर स्टेटस में लगाते हैं और कुछ पल के बाद उसे डिलीट कर देते हैं। अगले पल फिर कोई और मोटिवेशनल कोट्स लगाते हैं फिर कुछ पलों बाद हटा लेते हैं। यह प्रक्रिया क्रमशः चलती रहती है। 
दरअसल अकेलापन के शिकार और अवसादग्रस्त लोग अपने सोशल मीडिया और लोगों के बीच मोटिवेशनल बातें कहकर खुद को तो मोटिवेट करने की कोशिश करते ही हैं। साथ ही वो इन जगहों पर अपने अकेलापन को भूलने के लिए एस्केप ढूंढने की भी कोशिश करते हैं। वो बंद कमरे में अकेला बैठ नहीं सकते हैं। अगर बैठने की कोशिश भी की तो वो अकेलापन ऐसा डराता है कि इंसान विचलित और भयभीत होकर अपने आप को मोबाइल अथवा किसी और काम में व्यस्त रखने की कोशिश करता है। आपने ग़ौर किया कि आखिर इस लॉकडाउन ने क्यों लोगों को डिप्रेशन में भेज दिया। इसी समय सबसे ज़्यादा खुदकुशी क्यों हुई। क्यों इसने लोगों की ज़िंदगी बदल कर रख दी। क्योंकि आंतरिक तौर पर अकेला इंसान भौतिक तौर के अकेलापन को झेल नहीं पाया। उस अकेलापन ने उसे बंद कमरे के अंदर तोड़ कर रख दिया। और जो लोग बच गए उनमें से ज़्यादातर डिप्रेशन से घिर गए।
अकेलापन अथवा डिप्रेशन कभी भी इंसान के फाइनेंसियल स्टेटस को देखकर नहीं आता है। ना ही पावरफुल स्टेटस को देखकर। अगर ऐसा होता तो अमीर लोग, बड़े अधिकारी, नेतागण, एक सुप्रसिद्ध अभिनेता कभी खुदकुशी ही नहीं करते। दरअसल लोगों को लगता है कि अगर उसने ज़िंदगी में किसी मुकाम को हासिल कर लिया तो वह बहुत खुश और संतुष्ट रहेगा। उसकी उपलब्धि उसे इतनी खुशी दे देगी कि उसके आसपास कभी अकेलापन और डिप्रेशन भटकेगा तक नहीं। अगर सचमुच ऐसा होता तो आए दिन किसी IAS/IPS या बड़े अधिकारियों की खुदकुशी की ख़बर हमें नहीं मिलती। भारत के सबसे कठिन परीक्षा को पास करने के लिए इंसान अपनी दिन-रात की पूरी मेहनत लगा देता है। तमाम चुनातियों और संघर्षों की विपरीत परिस्थितियों को झेल कर इंसान बमुश्किल उस परीक्षा को पास कर अधिकारी बनता है। फिर भी उसे खुदकुशी क्यों करनी पड़ती है। उसे खुश और संतुष्ट रहना चाहिए कि जिस परीक्षा को उसने पास किया है वह समाज में नहीं बल्कि पूरे इलाके में सम्मान दिलाता है। उस पद की अपनी ठसक है। बड़े-बड़े पद पर आसीन राजनेताओं की भी खुदकुशी की ख़बर आती है। बीते दिनों एक राज्यपाल ने भी खुदकुशी कर ली। उसके अलावा खूब पैसेवाले भी खुदकुशी करते हैं। तो आखिर इस खुदकुशी की वजह क्या है। सबकुछ मिल जाने के बाद भी खुदकुशी का कारण क्या है। 
दअरसल इंसान आजीवन इस भूल में जीता चला जाता है कि ये भौतिक और सामाजिक उपलब्धियाँ ही उसे खुशी और संतुष्टि दे सकती है। जिसकी वज़ह से वह उसी होड़ में भागता रहता है। जिसे वो उपलब्धियाँ नहीं मिलती वो उसकी वजह से डिप्रेशन में चला जाता है और जिसे वो मिल जाती है वो उसे पाकर भी खुश और संतुष्ट नहीं हो पाता है। इस स्थिति की सबसे बड़ी वज़ह है उस इंसान के भीतर आध्यात्म की कमी। दरअसल इंसान यह समझ ही नहीं पाता है जीवन रूपी इस यात्रा में ये सब महज़ छोटे-छोटे पड़ाव हैं। पैसा, पावर, शोहरत आदि की अवस्था भौतिक है। यह आंतरिक नहीं है। और भौतिक अवस्था कभी भी आपको लम्बे समय तक अथवा आजीवन खुशी और संतुष्टि नहीं दे सकती है। इसकी खुशियाँ क्षणिक है। ये अवस्थाएं आपको भौतिक तौर पर सारी सुख-सुविधाएं दे सकती है। किंतु आंतरिक सुख-सुविधाएं कुछ पल के लिए ही प्राप्त हो सकता है। जीवन रूपी यात्रा के मार्ग में यह महज़ पड़ाव है। जबकि उस यात्रा को सुगम और सुख से चलाने के लिए आध्यात्मिक ईंधन की आवश्यकता होती है। यहाँ मेरा आध्यात्मिक का तात्पर्य वैरागी बनना या गृहस्थ का जीवन त्याग कर हिमालय की तराई में जाकर ध्यानमग्न होना नहीं है। मेरे अनुसार आध्यात्म का अर्थ है स्वयं की आत्मा का अध्ययन करना और यह समझने की कोशिश करना कि आत्मा और उसकी आंतरिक चेतना आपसे क्या चाह रही है। मसलन भौतिक सुविधाओं का भोग करते हुए भी आध्यात्मिक बनकर आध्यात्म की राह को चुना जा सकता है। मेरे अनुसार आध्यात्मिक का अर्थ है अपने भीतर की दुनिया में ध्यानमग्न होकर यात्रा करना। अपने विचारों की समझ और मानसिक पटल की गहराई में जाकर सकारात्मक विचारों को जन्म देते हुए उसके बीच भ्रमणशील रहना। वहीं असली सुकून और संतुष्टि है। उस मार्ग की गतिशीलता में इतनी शक्ति है कि आप ज़िंदगी की बड़ी से बड़ी चुनौतियां, नाकामियां और संघर्षों से निपटने में सक्षम बन जाएंगे। आप यह समझने की कोशिश कीजिये कि जब आपके भीतर परेशानी चल रही होती है अथवा आप अवसादग्रस्त होते हैं। तो वो बेचैनी आपके भीतर होती है। आपके शरीर के बाहरी हिस्से पर अथवा आपके आसपास की चीज़ों पर इसका कोई असर या बदलाव नहीं मालूम पड़ता है। ठीक उसी तरह आपको अपने भीतर के अकेलापन या डिप्रेशन से लड़ने के लिए आपको अपने भीतर की सकारात्मक शक्तियों का इस्तेमाल करना पड़ेगा। और भीतर की सकारात्मक शक्तियों को केवल आध्यात्म के ज़रिए ही पाया जा सकता है। इसलिए ज़िंदगी की तमाम भाग-दौड़ के बीच खुद के लिए समय निकाल कर आध्यात्म की राह ज़रूर चुनें। मैं आपको यक़ीन दिलाता हूँ कि आप इस जीवन रूपी यात्रा के बीच आने वाली हर चुनौतियों और संघर्षों से लड़ सकते हैं। अकेलापन और डिप्रेशन आपके आसपास तक नहीं भटकेगा।

Wednesday, October 31, 2018

पटेल और नेहरू कब तक रहेंगे दुश्मन ?

31अक्टूबर 1875 को जन्मे बल्लभ भाई पटेल का ऋणी है यह भारतीय भू-धरा। आज़ादी के सर्वव्यापी आंदोलनों से सरदार की उपाधि इनके नाम के साथ जुड़कर 'सरदार' शब्द स्वयं को श्रेष्ठ गरिमायुक्त पाता है। यह सरदार जैसे आदम्य साहस का व्यक्तित्व हो सकता है जिसने आज़ादी के बाद नूतन भारत के रियासतों को एकीकृत कर एक ऐसे भारत का सृजन किया जो खंडों में बिखरी रियासतें अखंड भारत की भुजाओं में समाहित हो गई। आधुनिक भारत के वास्तविक जन्मदाता पटेल और नेहरू की बौद्धिक दूरदर्शिता का ही नतीज़ा है। पटेल और नेहरू की वैचारिक असहमति जगजाहिर है। वो असहमतियां तत्कालीन दौर में भी जनसंवाद का विषय रहा और आज भी है। लेकिन उनके व्यक्तित्व की भद्रता इस बात को अभिप्रमाणित करती है कि दोनों नेताओं ने देशहित को सदैव वैचारिक असहमतियों से दूर रखा। दोनों के बीच भाषा की भद्रता और शब्दों की शालीनता अपने सबसे स्वर्णिम युगों में केंद्रित रही। जबकि मौजूदा दौर में दोनों नेताओं के संबंधों को नए तरीके से स्थापित की जा रहा है। दोनों के संबन्धों को सनातन काल के सबसे बड़े शत्रु के तौर प्रस्तुत किया गया है। नेहरू और पटेल के बीच निश्चित तौर पर वैचारिक प्रतिस्पर्धा थी। किन्तु उन वैचारिक प्रतिस्पर्धा ने कभी भी श्रेष्ठतम नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा को जन्म नहीं दिया। नए राष्ट्र को सिंचित करने में दोनों ने एक-दूसरे का भौतिक एवं वैचारिक सहयोग दिया। भारत के बंटवारे के खिलाफ़ गाँधी ने जब विरोध किया तब नेहरू और पटेल ने एक सुर में गाँधी के माँग को ख़ारिज कर दिया। यदि वैचारिक असहमति और श्रेष्ठताबोध की महत्वाकांक्षा कुंठाओं से भरी होती तो क्या दोनों नेता बंटवारे का समर्थन करते। जबकि स्वाधीनता के कई बरस पहले से सर्वविदित था कि आज़ादी के बाद प्रधानमंत्री की ज़िम्मेदारी नेहरू को मिलेगी। किन्तु बीते कुछ बरसों से नेहरू-पटेल को नए किरदार में बुना जा रहा है। उस किरदार की इमारत झूठ, कुतर्क और दुष्प्रचार पर खड़ी है। आज़ादी के दशक वाले नेहरू-पटेल यदि आज के नेहरू-पटेल के संबन्धों की तस्दीक करेंगे तो वे निश्चित तौर पर बिलख पड़ेंगे। अपने इस नव प्रतिपादित सम्बन्धों की कहानी सुन उनकी छाती फट जाएगी। पटेल और नेहरू के संबंधों को पुनर्गठित कर प्रस्तुत करने के पीछे की मंशा स्पष्ट है कि एक को दूसरे के अपेक्षाकृत उपेक्षित दिखाना है। एक का नेतृत्व दूसरे के नेतृत्व से पिछड़ा दिखाना है। जहाँ नेहरू की छवि हार्डकोर सेक्युलर के तौर पर बनाई गई वहीं पटेल की छवि राष्ट्रवादी हिंदू की गढ़ी गई। और दोनों को एक दूसरे वर्ग के बीच खलनायक के तौर पर पेश करने की साज़िश रची गई है। जबकि दोनों नेताओं ने आज़ादी के दौरान भारत के संरचना की कल्पना सेक्युलर देश के तौर पर की थी। पटेल और नेहरू के बीच त्याग और वैचारिक सम्मान का एक उत्कृष्ट प्रमाण यह भी मिलता है कि 1936 में अध्यक्ष पद के लिए फैजपुर कांग्रेस में दो नाम पटेल और नेहरू के सुझाए गए थे। किन्तु पटेल की राजनीतिक दृश्यता और नैतिकता की वजह से पटेल ने अपना नाम अध्यक्ष पद से वापस ले लिया। जबकि कई मामलों पर पटेल और नेहरू की नीति अप्रत्यक्ष तरीके से टकराई किन्तु वहीं खत्म हो गई। इस संदर्भ में आचार्य कृपलानी के स्मरण का एक प्रसंग मिलता है ' एक दिन सरदार पटेल ने गांधी जी से कहा कि फलां राजदूत अपनी दिनचर्या सुबह शराब से शुरू करता है और दिनभर पीता रहता है। उनके इस शिकायत के लहज़े पर गांधी ने पटेल से कहा कि यह बात आप पंडित नेहरू से क्यों नहीं करते। इसपर सरदार ने उनसे कहा कि पंडित नेहरू से मेरा एक अलिखित समझौता है कि एक-दूसरे के काम में कोई दखल नहीं देगा। वैसे भी नेहरू को यह बात मालूम है कि राजदूत अपनी मर्यादा तोड़ता है'।
इससे अव्वल उदाहरण और क्या हो सकता है कि सरदार पटेल नेहरू के कार्यप्रणाली से असहमत हैं किंतु अलिखित समझौते की प्रतिबद्धता उन्हें अनैतिकता के दायरे में बढ़ने से रोकती है। पटेल के असामयिक दिवंगत हो जाने का गहरा झटका नेहरू को लगा था। जिससे कई महीनों तक नेहरू अवसाद में चले गए थे। पटेल की कमी से नेहरू के जीवन और उनके मंत्रिमंडल में उतपन्न हुए खालीपन ने उनके जीवन व नेतृत्व क्षमताओं को प्रभावित कर दिया था। इस विपन्नता के मार्मिक क्षण को देख कोई कैसे यह दावा कर सकता है कि दोनों एक दूसरे के दुश्मन थे। कैसे कोई कह सकता है कि नेहरू ने सदैव पटेल की उपेक्षा की है। पटेल के मुकाबले नेहरू के कद को कम करने के लिए यह दुष्प्रचार फैलाया गया कि नेहरू ने अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर अपनी पुत्री इंदिरा गांधी का चुनाव किया जबकि पटेल के परिवार को राजनीतिक सक्रियता में प्रवेश नहीं करने दिया। किताबों और विश्वसनीय संदर्भों से दूर रहे लोगों ने झांसे में आकर इसे सत्य माना और अपने भीतर नेहरू को स्वार्थी और पटेल का दुश्मन समझा। जबकि सच्चाई यह है कि वंशवाद के आरोप में घिरे नेहरू ने आजीवन इंदिरा गाँधी को सांसद नहीं बनने दिया, जबकि पंडित नेहरू ने सरदार पटेल के बेटे और बेटी को कांग्रेस से टिकट दिलाकर संसद भेजा। नेहरू लोकतंत्र में वंशवाद के अपशय से डरते थे। तभी उन्होंने इंदिरा गांधी को पार्टी के भीतर कार्यकर्ता सदस्य के तौर पर बने रहने दिया किन्तु संवैधानिक पदों की राजनीति से उन्हें दूर रखा। जबकि इंदिरा बचपन से राजनीतिक आंदोलनों और विमर्शों से जुड़ी रहीं। प्रयागराज (इलाहाबाद) स्थित उनके आवास आनंद भवन में उनके दादा मोतीलाल नेहरू से लेकर पिता जवाहरलाल नेहरू ने उनके सामने स्वाधीनता की कई नीतियाँ बनाई। इंदिरा स्वतंत्रता सेनानी थीं फिर भी वंशवाद के अपशय से डरे नेहरू ने उन्हें अपने जीवन में संसद का मुंह नहीं देखने दिया। जबकि पटेल के मौत के बाद नेहरू ने सरदार की पुत्री मणिबेन को 1952 के आम चुनाव में काँग्रेस का टिकट दिलवाया। वे दक्षिण कैरा लोकसभा क्षेत्र से सांसद बनीं। 1957 में वे आणंद लोकसभा क्षेत्र से चुनी गईं। 1964 में कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेजा। वे 1953 से 1956 के बीच गुजरात प्रदेश काँग्रेस कमेटी की सचिव और 1957 से 1964 के बीच उपाध्यक्ष रहीं। नेहरू ने मणिबेन के अलावा सरदार पटेल के बेटे डाह्याभाई पटेल को भी लोकसभा का टिकट दिलाया। वे 1957 और 1962 में लोकसभा के लिए चुने गए और फिर 1973 में अपनी मौत तक राज्यसभा सदस्य रहे। नेहरू ने वंशवाद की अतार्किक नीतियों के तहत इंदिरा को संसद से दूर रखा किन्तु सरदार पटेल के वंशजों को अपने जीते जी संसद की मुख्य राजनीति में स्थापित कर दिया और उन्हें पार्टी में भी खूब यश और सम्मान मिला।

किन्तु इसे देश का दुर्भाग्य समझिये की दो आदम्य कद के नेताओं के इतने पवित्र रिश्ते को कुंठाग्रस्त होकर गढ़ा जा रहा है। लोकतांत्रिक असहमतियों को व्यक्तिगत शत्रुता का अमलीजामा पहनाया जा रहा है। किंतु इतिहास का उद्बोधन अमिट होता है। उसे क्षणिक भ्रमित किया जा सकता है किंतु भ्रमों के बुनियाद पर बदला नहीं जा सकता है। मसलन इतिहास दोनों दौर के नेहरू और पटेल के रिश्तों का मूल्यांकन करेगा। और इतिहास में दोनों इतिहास के किरदारों की तथ्यात्मक गणना होगी। 

Sunday, October 14, 2018

क्या देश के भीतर क्षेत्रवादी टकराहट गृह-युद्ध को जन्म दे सकती है?

उस मुल्क़ की कल्पना कितनी भयावह होगी। जब भीड़ ही न्याय और कानून को संचालित करने की संस्था बन जाए। भीड़ ही सत्ता और न्यायिक तंत्र के समानांतर खड़ी हो जाए। भीड़ ही लोकतंत्र को अधिग्रहित कर ले। भीड़ ही संविधान की प्रस्तावना से लेकर, तमाम अनुच्छेदों व अनुसूचियों को नष्ट कर दे। मेरे ख्याल से उस देश का भविष्य सीरिया,गाज़ा, इराक, बनाना रिपब्लिक से भी भयावह होगा। गुजरात में क्षेत्रवादी ताकतें भीड़ में तब्दील होने लगी है। बिहार, उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों के नागरिकों को गुजरात से भगाया जा रहा है। पलायनवादियों को यह दलील देकर भगाया जा रहा है कि एक बिहारी ने किसी बलात्कार के घटना को अंजाम दिया है, इसलिए सभी उत्तर भारतीयों को भगाया जाए।


यही स्थिति बीते कुछ बरस पहले महाराष्ट्र में हुई जहाँ उत्तर भारतीयों पर बर्बरता के साथ हिंसक हमले हुए। उनके रोजी-रोज़गार के स्थाई स्रोतों को नष्ट किया गया। वहां क्षेत्रवादी अराजकों द्वारा दलील दी गई कि उत्तर भारतीय महाराष्ट्र में गंदगी फैलाते हैं। प्रदेश के हक़ को उत्तर भारतीय पलायन कर लूट लेते हैं। क्षेत्रवाद के नाम पर हिंसा फैलाने वाले अराजकों को हर बार राजनीतिक शह प्राप्त होती है। लेकिन इन घटनाओं को लेकर मेरी कुछ चिंताए, कुछ परामर्श और कुछ निजी विचार हैं। मेरी चिंता सबसे पहले गुजरात में उत्तर भारतीय को भगाने के संदर्भ में है कि हमलावरों ने दलील दी कि एक बिहारी ने बलात्कार किया है इसलिए इन्हें प्रदेश से भगाया जा रहा है। हमलावरों के दलील पर मेरे सवालनुमा चिंता यह है कि क्या किसी एक कुकृत्य करने पर उससे जुड़े पूरे जाती,धर्म, राज्य, राष्ट्र के तौर पर सम्बंधित हर शख्स को निशाना बनाया जाना चाहिए।

यदि नहीं तो फिर किसी एक बिहारी की वजह से पूरे उत्तर भारतीयों को बलात्कारी की संज्ञा देकर भगाना कितना न्यायसंगत है। और यदि हाँ तो फिर उसी गुजरात राज्य से ललित मोदी, मेहुल चौकसी, नीरव मोदी भी नागरिक है फिर क्या हमलावरों के तर्क के आधार पर तमाम गुजराती नागरिकों पर संदेह करना न्यायसंगत है। मेरी नज़रों में तो बिलकुल नहीं। क्योंकि किसी इक्के-दुक्के के ओछापन की वजह से किसी समाज,धर्म, राज्य और राष्ट्र की गरिमा पर आँच नहीं आ सकती। लेकिन वज़ह शर्मनाक इसलिए भी प्रतीत होती है क्योंकि यह सारी स्थितियाँ राजनीतिक रणनीति के छाँव में तैयार की जाती है। क्षेत्रीयता के चेतनाओं को अन्य क्षेत्रीय नागरिकों के खिलाफ़ ज़हर फैलाकर एकत्रित करने की धारणा एक प्रगतिशील मुल्क़ के बर्बादी की सबसे बड़ी वजह होती है। किन्तु इस सम्पूर्ण संदर्भित विषय पर मैं संविधान की कुछ बुनियादी बातों का भी यहाँ ज़िक्र करना चाहूंगा।
संविधान के भाग 3 मौलिक अधिकार के अनुच्छेद 15 में स्पष्ट तौर पर ज़िक्र किया गया है कि ‘राज्य किसी भी नागरिक से धर्म, मूल-वंश, जाती, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेद-भाव नहीं करेगा’। अनुच्छेद 19A के D में स्पष्ट लिखा गया है कि ‘भारत के राज्यक्षेत्र में कोई भी कहीं भी घूम सकता है’। उसी अनुच्छेद के अगले भाग में रोजगार-व्यापार की स्वतंत्रता भी स्थापित की गई है। किन्तु मेरे विचार से संविधान के तमाम अधिकारों को खारिज़ कर क्षेत्रवाद की हिंसक चाशनी में देश को डुबोने की यह तरक़ीब भारत में आंतरिक युध्द को जन्म दे सकती है। यदि हर राज्य में बाहरी पलायन करने वाले नागरिकों को भगाना ही राज्य के तरक़्क़ी की प्राथमिकता बनने लगी, तो सर्व प्रथम संविधान के प्रस्तावना से ‘हम भारत के लोग’ को संशोधित कर अपने अनुसार राज्यों का ज़िक्र होना चाहिए।
जब देश और संविधान की धारणा राज्य पर हावी होते क्षेत्रवादी ताकतों के आगे बौनी दिखाई पड़ रही है और देश एवं संविधान की धारणा ही संशयात्मक है तो उसे भी हर स्तर पर संशोधित कर संघ-राज्य की मौलिक अधिकारों पर विमर्श करना चाहिए। क्योंकि गुजरात, महाराष्ट्र, असम, उड़ीसा, बंगाल आदि कई राज्यों से उत्तर भारतीयों पर हमला कर भगाया जा रहा है और पूर्व में भी भगाया जा चुका है। कतिपय, हर दौर में केंद्र की सरकार केवल मूकदर्शक का अभिनय करती रही है तो 1947 से टेरिट्री ऑफ इंडिया यानी भारत के राज्यक्षेत्र पर बनी धारणा एक फ़रेब नहीं तो क्या माना जाए। मसलन, पलायन न तो कोई बड़ी चुनौती है और न ही अनैतिक। वैश्वीकरण और ग्लोबलाइजेशन के दौर में राष्ट्रीय से लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर पलायन एक स्टेटस सिंबल मानी जाती है। फिर पलायन को किसी राज्य के लिए खतरा कैसे माना जाए।
गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, यूपी आदि के नाम पर क्षेत्रवाद की लड़ाई लड़ी जाती रही है जबकि जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का प्राप्त संवैधानिक दर्जा के नाम पर सभी राज्य के नागरिक अनुच्छेद 370 और 35A को खत्म करना चाहते हैं। उनकी लगातार माँग रही है कि जम्मू-कश्मीर से इन दो अनुच्छेदों को हटाकर आम नागरिक के लिए व्यापार और आवास के राह खोले जाएं जिससे उस राज्य का अधिक विकास हो। उसी 370 के हटाने के वायदे पर कई दफ़ा सरकार बन जाती है। राष्ट्रवादी चेतनाएं जागृत हो जाती है। जबकि जिन राज्यों में यह अवसर प्राप्त है उन राज्यों में क्षेत्रवाद के नाम पर हिंसा और ज़हर फैलाने की तमाम साज़िशों के तहत अन्य राज्य के नागरिकों को भगाया जा रहा। इस दोयम चरित्र की राजनीति और उसके कार्यकर्ताओं की ऐसी देशविरोधी साज़िश के खिलाफ सरकार और न्यायालय को कठोर कार्रवाई करनी पड़ेगी अन्यथा मुल्क़ में गृहयुद्ध की आशंका बढ़ सकती है।

Sunday, September 16, 2018

मैं एक प्रयोगशाला हूँ।

ज़िंदगी में निष्क्रिय हो जाना एक मरे हुए प्राणी के अलावा और कुछ भी नहीं है। मेरी हमेशा से कोशिश रही है कि खुद को किसी भी एक धारणा के खांचे में कैद न करूं। इसलिए जीवन में आए दिन तमाम किस्म के प्रयोग करता रहता हूँ। हर उस किस्म का प्रयोग स्वयं के जीवन पर करता हूँ जिसकी अभिलाषा मेरे भीतर जगती है। नवीन मीमांसा को भौतिक व नैसर्गिक संतुष्टि देने की अव्वल कोशिश करता हूँ। शिथिलता के सम्मुख केंद्रित  चेतना को जागृत करता रहता हूँ। बीते कई बरसों से ज़िंदगी में निरंतर नए प्रयोग करता रहा हूँ। उन प्रयोगों के सकारात्मक अनुभवों व उनसे उपजी शिक्षा को आत्ममुग्ध होकर स्वयं के भीतर स्थापित कर लिया हूँ। और नकारात्मक अनुभवों को परत दर परत खोलकर जो सिखा हूँ उससे स्वयं को अत्यधिक सुगम बनाया हूँ। हालांकि सकारात्मक अनुभवों के वनिस्पत नकारात्मक अनुभवों से जो अनुभूति प्राप्त किया हूँ वह निश्चित तौर पर स्वयं के लिए चुनौतीपूर्ण रहा। लेकिन उस अनुभूति की शिक्षा से जीवन के ऐसे गूढ़ रहस्य को जाना जिसने मेरे जीवन को ही प्रभावित कर दिया। इन नए-नवेले प्रयोगों और उसके प्रभावों ने बेशक जीवन को एक प्रयोगशाला कक्ष में परिवर्तित कर दिया लेकिन उससे अपने भीतर कई व्यापक तब्दीलियों को महसूस किया। कल तक जिसे मैं सिरे से नकार दिया करता था, आज उन तब्दीलियों को देख उत्सुक और अचंभित हो जाता हूँ। कल तक जिन तब्दीलियों की कल्पना कर अपने भीतर एक सहमा हुआ इंसान पाता था आज उन तब्दीलियों की गोद में खेलते हुए मेरे भीतर की आत्मा अत्यधिक आत्मविश्वासी और दृढ़ हो चुकी है। कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर मैं भी सामान्य जीवन के लिए भौतिक सुखों की कशमकश में भागता फिरता तो शायद स्वयं के ऊपर इतने प्रयोग न कर पाता जिसके फलस्वरूप बाहरी दुनिया में तो मशगूल रहता लेकिन अपने भीतर पल रहे अपनी चेतना को ही नहीं जान पाता। अगर जीवन में प्रयोग के प्रभाव से लोग भागते तो फिर बुद्ध को बोधिसत्व का निर्वाण, महावीर को अपरिग्रह अनेकांतवाद, ताओ धर्म के वयोवृद्ध उपासक लाओ-से, रजनीश नाम के सामान्य से इंसान ओशो से अप्रतिम इंसान नहीं बन पाते। इसलिए जीवन में नए प्रयोग की चुनौतियों को सहर्ष स्वीकार करता हूँ और उसे महसूस करता हूँ।

Thursday, September 6, 2018

मोदी शासन को ‘अघोषित आपातकाल’ कहना कितना सही है?

इतिहास महज़ किसी एक घटना का साक्षी नहीं होता है बल्कि वह हर्ष-विषाद, विनोद-रंजन का भी संकलन होता है। इतिहास के साथ सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कोई उसे बदल नहीं सकता, कोई उसे खारिज नहीं कर सकता, और कोई उसके स्मरण को नष्ट नहीं कर सकता है। लेकिन इतिहास से कई बातें सीखी जा सकती है, उससे सबक लिया जा सकता है, और उसे दोहराया अथवा दोहराने से रोका जा सकता है। इसलिए मैं इतिहास के संकलनों को संवर्धित करने का हमेशा से पक्षधर रहा हूँ। भारतीय संदर्भ में चाहे वह इतिहास प्राचीन रहा हो, चाहे मध्यकालीन अथवा आधुनिक। इसलिए चाहे जिन्ना के इतिहास को सहेजने की बात हो या, मुग़ल महलों के इतिहास को या, एडविन ल्युटियन के वास्तुकला को।  क्योंकि उस इतिहास का वही प्रसंग एक माध्यम है जिसके जरिये हम आने वाली पीढ़ियों को उससे रूबरू कराकर उसे सीखने अथवा सबक लेने की गुंजाइश रख सकते हैं। बहरहाल, इतिहास के संवर्धन के पक्ष में यह दलील इसलिए भी लिख रहा हूँ ताकि इस लेख में कुछ ऐतिहासिक संस्मरणों का ज़िक्र कर सकूँ। 
आज देश के भीतर एक शब्द 'अघोषित आपातकाल' बहुत प्रचलन में है। जहाँ एक तरफ सरकार के आलोचक इस दौर में फासीवाद की आहट सुनने का दावा कर अघोषित आपातकाल कह रहे हैं। वहीं सरकार और शासित राजनीतिक दलों ने इस आरोप का खंडन करते हुए इसे राष्ट्रहित में उठाए गए कठोर फैसलों की उपमा दी है। लेकिन सवाल यह है कि जब 1975 के आपातकाल का ज़िक्र 2014 से हर टीवी डिबेट और बैठकों में होने लगा है तो क्यों न 1975 के आपातकाल से पहले की घटनाओं में उसकी आहट को तलाशने की कोशिश की जाए और उन्हीं घटनाओं और परिणामों को मौजूदा स्थितियों में तलाशने की कोशिश करते हैं। 

आपातकाल भले ही 25 जून 1975 के मध्यरात्रि से लगाया गया था लेकिन इसकी शुरुआत कहीं न कहीं 1969 से हो चुकी थी। इंदिरा गाँधी ने सबसे पहले अपनी पार्टी के भीतर ही लोकतंत्र को खत्म किया। जब कांग्रेस महासमिति के सामने इंदिरा गांधी 'आर्थिक मसलों पर कुछ सोच विचार' विषय रखा। उस पर कांग्रेस कार्यसमिति में कोई विचार नहीं हुआ था। यह कांग्रेस की परंपरा का उल्लंघन था। उसके बाद 12 जुलाई 1969 को कांग्रेस पार्लियामेंट्री बोर्ड की बैठक हुई। राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार का चयन करना था। डॉ जाकिर हुसैन के निधन से पद खाली था। बैठक में किसी नाम पर आम राय नहीं बनी। बहुमत से नीलम संजीव रेड्डी का नाम तय हुआ। इंदिरा को यह नाम रास नहीं आया। उन्होंने इस बहुमत को अपने लिए चुनौती माना और 'नतीजे भयानक होंगे' की धमकी दी। फिर 4 दिन बाद 16 जुलाई 1969 को उन्होंने मोरारजी देसाई को वित्तमंत्री के पद से हटा दिया। यह फैसला स्वयं में कांग्रेस के लिए अचंभित था। फैसले पर कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई और मामला तात्कालिक कांग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा और प्रधानमंत्री पर छोड़ दिया गया। निजलिंगप्पा राष्ट्रपति चुनाव में व्यस्त हो गए। इंदिरा का इरादा कुछ और था। कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री से कहा कि वे कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने के लिए व्हिप जारी कराएं। लेकिन इंदिरा ने वी.वी गिरी को समर्थन देकर राष्ट्रपति बना दिया। 18 अगस्त 1969 को कांग्रेस अध्यक्ष ने इंदिरा गांधी से पूछा कि वे सफाई दें कि उन्होंने विरोधी उम्मीदवार को जिताने के लिए क्यों अपील की। लेकिन इंदिरा ने ध्यान नहीं दिया। इस तरह कांग्रेस दो हिस्से में बँट गई। इस घटना से कांग्रेस में एक नया अध्याय शुरू हुआ और इंडियन नेशनल कांग्रेस अचानक से इंदिरा कांग्रेस बनी। पहले पार्टी का लोकतंत्र नाश हुआ फिर बाद में ऐसी परिस्थिति बनी कि अपनी कुर्सी बचाने के लिए देश के लोकतंत्र नाश कर इमरजेंसी थोप दिया। 25 जून 1975 के मध्य रात्रि को इमरजेंसी लगने के बाद सरकार ने दावा किया कि इमरजेंसी लगने से वस्तुओं की क़ीमतें घटी है। काला बाजारी बंद हुई। समय पर ट्रेनें चलने लगी। इमरजेंसी लगाए जाने के विरोध में मुंबई की संगठन कांग्रेस की प्रदेश कमेटी ने एक सभा घोषित की। उसमें आचार्य जे.बी कृपलानी और एस. के पाटिल बुलाए गए। दोनों ने मिलकर सरकारी को चुनौती देते हुए उन दावों का मजाक उड़ाया और पूछा कि यह सब करने के लिए इमरजेंसी की क्या जरूरत थी। जिन विपक्षी नेताओं को जेल में बंद किया, क्या वे इन बातों का विरोध कर रहे थे। उन्होंने अपनी अपील में कहा कि इमरजेंसी से ध्यान हटाने के लिए इंदिरा गांधी सरकार यह तरीका अपना रही है। इमरजेंसी के दौरान आचार्य कृपलानी ने लेख और पत्र अखबारों के लिए लिखे। एक पत्र उन्होंने 30 जून 1975 को लिखा उसे अनेक संपादक को भेजा। उसमें यह याद दिलाया कि आजादी से पहले भारतीय समाचार पत्रों ने अनेक कष्ट और दंड झेलकर भी अपना कर्तव्य निभाया। वह संघर्ष आजादी के लिए था। इमरजेंसी से आजादी खतरे में पड़ गई है। तब क्या अखबारों को चुप रहना चाहिए। अखबारों को तमाम खतरे मोल लेकर बताना चाहिए कि इमरजेंसी के दौरान क्या हो रहा है। उन्होंने सलाह दी कि प्रेस सलाहकार परिषद और संपादक सम्मेलन की समीक्षा बैठक होनी चाहिए। उसमें इसका लेखा-जोखा होना चाहिए कि इमरजेंसी के दौरान क्या हो रहा है और कैसे अपनी आजादी सुरक्षित रखी जा सकती है। इस पत्र को किसी ने नहीं छापा। इमरजेंसी के दौरान जिस तरह संविधान का 42वां संशोधन किया गया। प्रेस काउंसिल परिषद को कुचला गया। वैचारिक और राजनीतिक विरोधियों को ठिकाने लगाया गया। सरकार ने तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर उसकी स्वायत्तता को अगवा कर अपना आधिपत्य जमा लिया था। सरकार यह सब इमरजेंसी की मदमस्त छाँव में कर रही थी तो आज सवाल यह भी उठता है कि क्या इमरजेंसी के लगने और होने की आहट का पैमाना यही सारी स्थितियां है। 
1969 से लेकर 1977 तक जो राजनीतिक घटनाक्रम रही क्या उसकी  2014 से लेकर  तुलना करना तर्कसंगत है। यदि सरकार और शासित दलों के विरोधियों का आरोप है कि देश में अघोषित आपातकाल थोपा जा रहा है तो क्या अब अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रपति के औपचारिक ऐलान होना ही बाकी है। फिर तो हर सरकारी कठोर रवैया पर कोई भी अघोषित आपातकाल लगाने का आरोप जड़ सकता है। लेकिन जब ज़िक्र इतिहास से सीखने और उससे तुलना कर समझने का हुआ है तो फिर क्यों न मौजूदा वक्त में सरकार के मई 2014 से लेकर अब तक के घटनाक्रमों की तुलना 1969 से लेकर 1977 के बीच की घटनाओं के साथ किया जाए। एक तुलनात्मक नज़र तो डाला जा सकता है कि जिस कांग्रेस के दो टुकड़े हुए तो क्या भाजपा भी आंतरिक कलह की वजह से दो टुकड़ों में बँटी है या क्या बँटने की कगार पर है। क्या आपातकाल के दौरान घटी हर घटना और आज घट रही घटनाओं में कोई समानता पाई जा रही है। क्या आचार्य कृपलानी ने 1975 में जो चिट्ठी संपादकों को लिखकर पत्रकारिता बचाने की बात की उस चिट्ठी की ज़रूरत आज के संपादकों को भी देने की है।  इस मसले पर देश की जनता को स्वयं विचार करना होगा अथवा अघोषित आपातकाल शब्द के मायने एक राजनीतिक क्षोभ के अलावा और कुछ नहीं ज्ञात होगा।

Saturday, August 25, 2018

प्यार कोई हार-जीत का खेल नहीं है ।

जहाँ प्यार बेशुमार होता है वहाँ तक़रार निश्चित है। दो प्रेमियों के बीच अक्सर लड़ाइयां होती रहती है। प्यार में लड़ाई होनी चाहिए। अगर में दो प्रेमियों के बीच कभी भी किसी बात को लेकर लड़ाई नहीं होती है तो समझिए कि दोनों के बीच प्यार नहीं है। बल्कि दोनों के बीच कोई एक कॉम्प्रोमाइज कर रहा है। या यूं कह लीजिए कि दोनों में से कोई एक प्रेमी पक्का दिमाग से रिश्ते निभा रहा है। जो कि प्यार का भविष्य घातक हो सकता है। प्यार में लड़ाई होनी चाहिए। क्योंकि प्यार शक्कर है और लड़ाई नमक। आखिर हैं तो सभी इंसान ही दिन-रात शक्कर से मन और जीवन दोनों भर जाएगा। फिर कभी भी शक्कर अर्थात प्यार करने का मन नहीं करेगा। जब भी आप प्रेमी की ओर देखेंगे जी उबा-उबा सा लगेगा। एक वक्त ऐसा आएगा जब प्यार और प्रेमी दोनों को छोड़कर आप भागना चाहेंगे। इसलिए प्यार को संतुलित बनाए रखने के लिए शक्कर और नमक अर्थात प्यार और लड़ाई रिश्ते को निभाने के लिए बहुत ज़रूरी है। हाँ जहाँ आप औपचारिक रिश्ते निभाते हैं वहाँ केवल शक्कर ही बने रहें, लेकिन प्यार तो इतने निजी रिश्ते होते हैं कि ये भनक दिल के अलावा दिमाग तक को नहीं लगती।
लेकिन प्यार है क्या। एक एहसास ही तो है जो खुद से खोकर होकर खुद में ही मिल जाता है। जब इंसान प्यार करता है तब वह अपने भीतर एक ऐसे चरित्र को पाता है जिससे वह पहले कभी मिला ही नहीं है। वह बेचैन हो उठता है कि यह तो मैं था ही नहीं जो मैं एक प्रेमी के तौर पर होता हूँ। दरअसल प्यार में इंसान दिल के बहाव में बहता चला जाता है। इसमें न तो कोई नफा-नुकसान का गुणनखंड देखता है और न ही कोई ख़रीद-फ़रोख्त का अलजेब्रा। इसलिए इंसान पहली बार अपने भीतर एक ऐसे शख्स को पाता है जिससे वह कभी मिला ही नहीं है। तभी तो मेरी एक मित्र हमेशा कहा करती थी कि 'प्रेरित प्यार में इंसान का कैरेक्टर बदल जाता है'। मैं उनकी बातों को अक्सर हँस कर टाल दिया करता था। लेकिन उनकी बातें बिलकुल सही थी। प्यार में सचमुच इंसान का कैरेक्टर बदल जाता है। प्यार में इंसान के हाव-भाव, सोचने के तरीके, जज़्बातों की कदर आदि कई तरीके की तब्दीली आती है। और यही सारी तब्दीलियाँ उस इंसान के कैरेक्टर को बदलकर एक प्रेमी बना देता है। लेकिन यदि प्यार की कोई परिभाषा तलाशने की कोशिश करता है तो उसका प्रयास व्यर्थ है। क्योंकि अक्सर नए-नए आशिक जल्दी से प्यार के तमाम एहसासों को छूने और उसे महसूस कर जीने की फ़िराक में लगे रहते हैं। जबकि प्यार एक ऐसी गहराई है जहाँ अगर आप सही मायने में उतरते हैं तो उस गहराई की कोई सीमा नहीं है। अर्थात उस प्यार का कोई आखिरी पड़ाव ही नहीं होता और उसके एहसास में दर्द और मरहम दोनों आपको स्वतः प्राप्त होते हैं। प्यार का एहसास तो ऐसा है कि 

"इश्क़ जब तुमको रास आएगा, ज़ख्म खाओगे मुस्कुराओगे, वो तुम्हें तोड़-तोड़ डालेगा, तुम टूट-टूट जाओगे, याद आएंगी गुमशुदा नींदें, ख़्वाब रख-रख के भूल जाओगे"।

हालांकि प्यार की एक ही शर्त होती है कि प्यार की कोई शर्त नहीं होती। लेकिन फिर भी प्यार में रिश्ते को संतुलित और ताउम्र बनाए रखने के लिए कुछ शर्तें होती है। जिसे लोग अक्सर नज़रअंदाज़ करते हैं और वही नज़रअंदाज़ उनके रिश्तों के टूटने की वजह होती है। दरअसल प्यार भले ही दो प्रेमियों के जज़्बातों का जुड़ाव होता है लेकिन उन दोनों के एहसास एक हो चुके होते हैं। दोनों के बीच की इमोशनल बॉन्डिंग और अटैचमेंट ही दोनों को एक बनाती है। प्यार की पहली शर्त, प्यार के स्पेस में कभी ईगो यानी की अहम की जगह नहीं होनी चाहिए। प्यार के स्पेस में प्यार के लिए ही जगह रहने दीजिए जहाँ प्यार के स्पेस में आप अपने ईगो को घुसाएँगे वहाँ वह ईगो आपके बीच के प्यार को खत्म कर ईगो भर देगा। और वही ईगो एक दिन आपके रिश्ते का कत्ल कर देगा। प्यार में स्वाभिमान होना चाहिए। दोनों को एक दूसरे के स्वाभिमान का सम्मान करना चाहिए लेकिन आपको स्वाभिमान और अहंकार के बीच बुनियादी फर्क को समझना आना चाहिए। दूसरी शर्त है कि आप असल में जो हैं वहीं रहा कीजिये, दिखावा उसके पास किया जाता है जहाँ फायदा उठाने की बात हो। दरअसल लोग जो अंदर से जो होते हैं वह वो दिखाने से बचते हैं ताकि उस रिश्तें में सबकुछ परफेक्ट दिखे। लेकिन उन्हें इस बात का जरा सा भी ध्यान नहीं रहता कि आप चेहरे पर नक़ाब लगाकर खुद को वहाँ छिपा सकते हैं जहाँ कुछ पल आपको गुजारने हैं न कि जहाँ आपको हर पल गुजारना है। आप खुद ही सोचिये कि जैसा व्यवहार आप ऑफिस में या किसी बिजनस मीटिंग के दौरान करते हैं क्या आप बिलकुल वैसे ही अपने घर पर भी व्यवहार करते हैं। नहीं न, फिर आप जो हैं वही आप अपने प्रेमी के सामने रहा कीजिये। अक्सर लोग अपनी प्रेमी/प्रेमिका को खोने के डर से बिलकुल उसी तरह व्यवहार करते हैं जैसा एक-दूसरे को पसंद आता है लेकिन जब आपकी असलियत नज़र आती है तो वही वज़ह आपके रिश्तों में दरार पड़ने की होती है। और सबसे आखरी बात जिसे रिलेशनशिप के दौरान सबसे ज़्यादा ख्याल रखना चाहिए वह यह है प्यार कोई खेल नहीं होता है और प्रेमी कोई खिलाड़ी नहीं। लेकिन अक्सर लोग ग़लती कर बैठते हैं और दोनों प्रेमी आपसी प्रतिस्पर्धा में लग जाते हैं। उनके लिए जीत का मतलब होता है अपने शर्तों पर झुका लेना या अपने मन मुताबिक काम करा लेना। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि अपनों से कैसी हार और जीत। अपनों के बीच के लिए जीत और हार का वजूद नहीं होता है बल्कि वह परायों के लिए होता है। आप तो उसी वक़्त हार चुके होते हैं जब आपके दिल की धड़कनों पर किसी और का राज हो चुका होता है। उसके दूर और पास होने से उसमें सुकून और घबराहट होने लगती है। जिंदगी में एक वही हार है जिसे जो जितना हारता है वो उतना ही विजयी बनता है। लेकिन प्रेमी अक्सर प्रेम में हार और जीत के खेल को रचने के चक्कर में चक्रव्यूह में उलझकर रिश्ते की हत्या कर देते हैं। 'ज़िंदगी के फ़लसफ़ा में भले ही जीत के अपने गुरुर हों, लेकिन प्यार में सामने वाले को जीताकर ही आप असली विजेता बनते हैं।' दोनों एक दूसरे से इतना प्यार करते हैं कि बग़ैर एक पल भी दोनों अलग नहीं रह सकते। लेकिन जीतने के अहंकार में वह खुद को तड़पाकर वक़्त बर्बाद कर देंगे लेकिन "पहले मैं क्यों, पहले वो क्यों नहीं। हर बार मैं ही क्यों उसके सामने झुकूँ, वो मेरे सामने क्यों नहीं झुक सकता/सकती। क्या केवल उसके पास ही ईगो है, मेरी भी तो कोई सेल्फ रेस्पेक्ट है।" यही सब सोचकर एक अच्छे खासे रिश्ते की वो दोनों तिलांजलि दे देते हैं। और अगर कोई दूसरे को मनाने की कोशिश करता है तो इस झूठी जीत के चक्कर में जो एक प्रेमी दूसरे प्रेमी के कमजोरी का फायदा उठाने लगता/लगती है। लेकिन जो इस कमजोरी का फायदा उठाकर खुद को बड़ा साहसी विजेता मानने की कोशिश करता/करती है वह दरअसल प्रेम के भाषा को समझ ही नहीं पाते हैं। इसलिए अक्सर मुझे यह बातें सोचने को मजबूर कर देती है कि 

'यह मोहब्बत भी क्या चीज़ है न... जहाँ इंसान एक आदमी के लिए कमज़ोर होकर मर रहा होता है, वहीं दूसरा इंसान अपनी ताक़त दिखाकर मार रहा होता है'। इसलिए एक प्रेमी का विकल्प कोई दूसरा कभी नहीं हो सकता है। हर इंसान के भीतर कुछ ऐसी विशेष चीज़े होती है जो केवल उसके भीतर ही होती है। इसलिए आप निश्चित कुछ पल के लिए किसी और में खोकर उसे भूल सकते हैं लेकिन उसे हमेशा के लिए आप अपने दिल की धड़कनों और अपने दिमाग से नहीं निकाल सकते हैं।

Wednesday, August 15, 2018

आज़ादी के दिन गांधी की बेबसी !!

आज भारतीय स्वतंत्रता दिवस है। 71 बरस पहले हमारे पूर्वजों ने गुलामी के परचम को माथे से हटाकर औपचारिक तौर पर स्वाधीनता हासिल की। लिहाज़ा इस आज़ादी दिवस के तौर पर उन स्वाधीनता के महावीरों को याद करते हुए आज की नई पीढ़ियों को देश के बंटवारे से जुड़ी कुछ बातों से रूबरू कराना चाहता हूँ ताकि स्वाधीनता के महावीरों को लेकर उनके मन में कोई भ्रम अथवा वहम की गुंजाइश न हो।

मुल्क़ के बंटवारे की तोहमत अक्सर गाँधी पर लगाई जाती है और कहा जाता है कि गाँधी ही भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के गुनहगार हैं। ये तोहमत और भ्रम ऐसे लोग लगाते हैं जो नए इतिहास के निर्माण में भरोसा करते हैं। इसलिए अगस्त 1947 के तात्कालिक परिस्थितियों को जरा टटोलने की कोशिश करते हैं।
महात्मा गाँधी देश के बंटवारे के पक्ष में बिलकुल नहीं थे। उनका स्पष्ट मत था कि कांग्रेस को किसी भी परिस्थिति में में देश के विभाजन का समर्थन नहीं करना चाहिए। गाँधी ने साफ कहा था कि अंग्रेजों को हिंदुस्तान बिना किसी शर्त के छोड़ के जाना होगा और यदि बंटवारा होना ही आखरी परिणाम है तो अंग्रेजों के जाने के बाद होना चाहिए। गाँधी ने तत्कालीन वायसराय के समक्ष विचार रखा कि उन्हें जिन्ना को निमंत्रण देना चाहिए कि वह मुस्लिम लीग की ओर से सरकार बनाएं। अगर वे देश के सभी लोगों के हित में काम करते हैं तो कांग्रेस को उनका समर्थन करना चाहिए। यदि लीग यह प्रस्ताव ठुकरा दे तो कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए। सरदार पटेल और जवाहरलाल ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। गाँधी जी को नजरअंदाज कर कांग्रेस कार्यकारिणी ने कैबिनेट मिशन की योजना स्वीकार कर ली। एक पुस्तक 'गाँधी : हिज लाइफ एंड थॉट, पब्लिकेशंस डिवीजन, भारत सरकार, नई दिल्ली, 1970, पृष्ठ संख्या 281' में आचार्य जेबी कृपलानी लिखते हैं कि माउंटबेटन ने गाँधी जी से यहाँ तक कह दिया 'कांग्रेस आपके साथ नहीं,बल्कि मेरे साथ है।' इस बात ने गाँधी को झकझोर कर रख दिया। गाँधी ने निर्णय लिया कि वह आज़ादी के इस त्योहार में शामिल नहीं होंगे। गाँधी और खान अब्दुल गफ्फार खान आखरी कोशिश तक जुटे रहे कि मुल्क़ का विभाजन न हो। 
गाँधी ने कहा कि दुर्भाग्य से आज हमें जिस तरह की आज़ादी मिल रही है यह दरअसल भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच टकराव का बीज है। 9 अगस्त 1947 से ही गाँधी मुल्क़ के भीतर मचे साम्प्रदायिक त्रासदी को रोकने कलकत्ता पहुँचे। आज़ादी के दिन सड़कों पर मचे कत्लोगारत को रोकने बंगाल के एक बस्ती नोआखाली(अभी बांग्लादेश) में जाकर दंगे को रोकने में जुटे गए। अभी गाँधी ने नोआखाली में सामाजिक सद्भाव की स्थापना ही की, कि अचानक उन्हें जानकारी मिली कि बिहार भी साम्प्रदायिक आग में झुलस रहा है। गाँधी ने फौरन बिहार जाने की तैयारी की और अगले पल बिहार में पहुँचकर दंगे को रोकने में सफल रहे। गाँधी की इस अद्वैत शक्ति को देखते हुए मौलाना अबुल कलाम आज़ाद नें गाँधी को सूचना दी कि दिल्ली स्थित जामा मस्जिद भी साम्प्रदायिक तनाव के चपेट में आ चुका है और इसे अब केवल आप ही रोक सकते हैं। 

गाँधी के इस सफल पहल पर माउंटबेटन लिखते हैं कि पंजाब में दंगे पर काबू पाने के लिए हमारे पर 55 हजार सेेेेना था, जबकि बंगाल में केवल एक इंसान की वजह से सभी दंगों पर काबू पा लिया गया। गाँधी को जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी शहर में शांति और सद्भावना के लिए बधाई देने पहुँचे तो गाँधी ने कहा कि 'जब तक हिन्दू और मुस्लिम एक साथ प्रेम से न रहेंगे तब तक ये सब व्यर्थ है।' गाँधी का योजना था आगे दिल्ली फिर पंजाब और उसके बाद लाहौर जाकर पूरे देश में शांति स्थापित करना । लेकिन शांति और अहिंसा के उपासक उस अद्वैत इंसान  की हत्या कर दी गई।

गाँधी भी चाहते तो नेहरू,पटेल आदि आज़ादी और बंटवारे के बड़े हिमायती नेताओं की तरह दिल्ली में आराम फ़रमाते हुए सत्ता की राह ताके उजड़ते मुल्क़ की बदनसीबी और लाखों के खून से लिपटी दो नए मुल्क़ के जन्म पर सोहर गीत गा रहे होते। लेकिन उन्होंने मानवता की इस बदनीयती के ख़िलाफ़ अपने जान को जोखिम में डालते हुए जलते मुल्क़ पर सद्भावना के पानी का छिड़काव किया। लेकिन कुछ लोगों की बदनीयती और इतिहास की प्रामाणिकताओं से वंचित कमज़र्फ़ों ने गाँधी के नियत और चरित्र पर ही हमला करना शुरू कर दिया। नए पीढ़ियों को गाँधी के असली इतिहास से दूर रख मनगढ़ंत इतिहास को बताकर गाँधी के बारे में नफ़रत भरा। लेकिन गाँधी का महत्व सनातनी संस्कृति के अनुसार उस पावन गंगा और यमुना की तरह है जो मौला और कुचैला होने के बाद भी उसकी अपनी प्रासंगिकता और महत्व कभी कम नहीं होगी।